केरल हाईकोर्ट का कड़ा रुख: वक्फ बोर्ड की 'जमीन कब्जे की चाल' पर ब्रेक
नई दिल्ली । डेस्क: केरल हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने वक्फ बोर्ड की मनमानी पर करारा प्रहार किया है. अदालत ने मुनंबम इलाके को वक्फ संपत्ति बताकर अधिसूचित करने को बोर्ड का 'जमीन हड़पने का सस्ता हथकंडा' करार दिया. जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और श्याम कुमार वीएम की बेंच ने साफ कहा कि बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए कोई संपत्ति वक्फ की श्रेणी में नहीं डाली जा सकती.
इस फैसले से न सिर्फ विवादित जमीन पर जांच आयोग के गठन का सरकारी आदेश बरकरार रहा, बल्कि बोर्ड की 70 साल पुरानी चुप्पी पर भी सवाल उठे.
मामला एर्नाकुलम जिले के चेराई और मुनंबम गांवों का है, जहां सैकड़ों परिवारों की जमीन पर वक्फ बोर्ड ने अचानक दावा ठोंक दिया. इन परिवारों के पास रसीदें सबूत हैं कि उन्होंने दशकों पहले ही ये संपत्तियां खरीद ली थीं. बोर्ड की इस हरकत से इनकी आजीविका पर संकट मंडराने लगा.
कोर्ट ने चेतावनी भरी टिप्पणी की कि अगर ऐसी मनमानी को बर्दाश्त किया गया, तो कल को ताजमहल, लाल किला या यहां तक कि विधानसभा भवन जैसी ऐतिहासिक इमारतों पर भी वक्फ का दावा हो सकता है. 'हमारी अदालत की इमारत को भी निशाना बनाया जा सकता है,' बेंच ने व्यंग्य के साथ कहा.
वक्फ एक्ट 1995 की धाराओं का हवाला देते हुए कोर्ट ने जोर दिया कि अधिसूचना बिना जांच-पड़ताल के अवैध है. राज्य सरकार को समिति की रिपोर्ट पर अमल करने की छूट दी गई, लेकिन देरी पर बोर्ड को फटकार लगाई. जस्टिस ने कहा, 'पंथनिरपेक्ष भारत में ऐसी देरी से शक्ति का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं.'
यह फैसला न सिर्फ स्थानीय निवासियों के लिए राहत है, बल्कि पूरे देश में वक्फ संपत्तियों पर बढ़ते विवादों को नई दिशा दे सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सख्ती बढ़ेगी. केरल सरकार ने पिछले नवंबर में पूर्व चीफ जस्टिस सीएन रामचंद्रन नायर की अगुवाई में आयोग बनाया था, जो अब स्वामित्व की पड़ताल करेगा.
परिवारों ने इसे न्यायिक जीत बताया, जबकि बोर्ड ने अपील का संकेत दिया. कुल मिलाकर, यह फैसला संपत्ति अधिकारों की रक्षा में मील का पत्थर साबित हो रहा है.