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अमेरिका से मोहभंग: चीन ने घटाया अमेरिकी बॉन्ड, सोने पर बढ़ाया भरोसा

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17 सित. 2026, 06:17 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

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रायपुर । सीजीखबर डेस्क: दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच वित्तीय मोर्चे पर एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. अमेरिकी ट्रेजरी विभाग की ओर से जारी ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जुलाई महीने में चीन ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड (यूएस ट्रेजरी) में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 618 अरब डॉलर कर दी है. यह पिछले 18 वर्षों (अगस्त 2008 के बाद) का सबसे निचला स्तर है.


दूसरी ओर, चीन अपनी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करते हुए लगातार सोना खरीद रहा है. पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (चीन का केंद्रीय बैंक) ने अगस्त में लगातार 22वें महीने अपने सोने के भंडार में बढ़ोतरी करते हुए इसे 76.73 मिलियन ट्रॉय औंस तक पहुँचा दिया है.


आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब है?


जब दो आर्थिक महाशक्तियों के बीच इस तरह की खींचतान होती है, तो इसका असर केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहता. एक आम नागरिक के तौर पर इसे इस तरह समझा जा सकता है: जब अमेरिका की साख और कर्ज़ पर संकट आता है, तो वैश्विक बाज़ारों में अनिश्चितता बढ़ती है. इससे क्रूड ऑयल, खाने-पीने की चीज़ें और आयातित सामान महंगे हो सकते हैं.


चीन जैसे बड़े देश जब लगातार टन के हिसाब से सोना खरीदेंगे, तो बाज़ार में सोने की मांग बढ़ेगी और इसकी कीमतें रिकॉर्ड स्तर छुएंगी. आम लोगों के लिए सोने के गहने या निवेश महंगा होना तय है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में किसी भी प्रकार की उथल-पुथल से भारतीय और वैश्विक शेयर बाज़ारों में अस्थिरता का माहौल बनता है, जिससे छोटे निवेशकों पर असर पड़ता है.


चीन क्यों बेच रहा है अमेरिकी कर्ज़?


चीन और अमेरिका के रिश्ते काफी समय से तनावपूर्ण रहे हैं. चीन का अमेरिका से दूरी बनाने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:


रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह अमेरिका ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर रूस की संपत्ति फ्रीज़ की और डॉलर-आधारित वित्तीय प्रणाली से उसे अलग किया, उससे चीन सतर्क हो गया है. चीन को डर है कि भविष्य में अमेरिका यही चाल उसके खिलाफ़ भी चल सकता है. अमेरिका पर कर्ज़ का बोझ लगातार बढ़ रहा है. निवेशकों को चिंता है कि क्या वॉशिंगटन लंबे समय में इस कर्ज़ को संभाल पाएगा या नहीं. इसी डर से विदेशी देश अमेरिकी सरकारी बॉन्ड से अपना पैसा निकाल रहे हैं.


भू-राजनीतिक तनाव और वित्तीय जोखिमों से बचने के लिए चीन डॉलर छोड़कर सोने को सबसे सुरक्षित विकल्प मान रहा है.


अमेरिका पर क्या पड़ेगा इसका प्रभाव?


चीन का यह कदम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी की तरह है. अमेरिकी सरकार को अपना काम चलाने और बजट घाटा पूरा करने के लिए लगातार कर्ज़ (बॉन्ड जारी करके) लेना पड़ता है. जब चीन और जापान जैसे बड़े खरीदार बॉन्ड बेचना शुरू करेंगे, तो अमेरिका को नए निवेशकों को आकर्षित करने के लिए ऊंची ब्याज दरें देनी पड़ेंगी.


दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों का अमेरिकी डॉलर से ध्यान हटकर सोने और अन्य परिसंपत्तियों की तरफ जाना 'डी-डॉलराइजेशन' (De-Dollarisation) को बढ़ावा देता है. इससे वैश्विक बाज़ार में डॉलर की पकड़ कमज़ोर हो सकती है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने हाल ही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है. अगर बॉन्ड Yields बढ़ते रहे, तो अमेरिकी सरकार के लिए खुद का कर्ज़ चुकाना और भी महंगा हो जाएगा, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ सकती है.


बाकी देशों की क्या है स्थिति?


यह ट्रेंड सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है. जुलाई में कुल विदेशी निवेशकों की अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग्स घटकर 9.25 ट्रिलियन डॉलर रह गई. अमेरिकी कर्ज़ के सबसे बड़े विदेशी धारक जापान ने भी जुलाई में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 1.1 ट्रिलियन डॉलर कर दी है. हालांकि, ब्रिटेन (UK) ने अपनी होल्डिंग बढ़ाकर 998.3 अरब डॉलर कर ली है और वह चीन को पीछे छोड़कर दूसरे स्थान पर बना हुआ है.


कुल मिलाकर, चीन का अमेरिकी कर्ज़ से पीछे हटना और सोने का विशाल भंडार बनाना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की नींव और रणनीतियाँ पूरी तरह बदलने वाली हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP