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'ब्रेन डेथ' घोषित करने की ट्रेनिंग नहीं: 2 लाख ब्रेन डेथ में से सिर्फ 1100 अंगदान

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12 अक्टू. 2025, 01:43 AM 2 मिनट में पढ़ें 2

Organ Donation
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नई दिल्ली । डेस्क: देश में 'ब्रेन डेथ' घोषित करने के लिए अधिकांश डॉक्टरों के पास पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है. दिल्ली एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है, जिसके कारण देश में अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन ट्रांसप्लांट) का काम प्रभावित हो रहा है. एम्स के सर्वे के मुताबिक, हर साल देश में लगभग दो लाख लोग 'ब्रेन डेथ' का शिकार होते हैं, लेकिन इनमें से केवल 1100 मरीजों के अंग ही प्रत्यारोपण के लिए उपयोग किए जाते हैं.


ट्रेनिंग का अभाव: सर्वे में शामिल 177 जाने-माने डॉक्टरों और विशेषज्ञों में से लगभग आधे (59.2 प्रतिशत) ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान उन्हें मरीज को 'ब्रेन डेथ' घोषित करने की कोई ट्रेनिंग नहीं मिली थी.

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पाठ्यक्रम की कमी: 37.3 प्रतिशत डॉक्टरों ने कहा कि 'ब्रेनस्टेम डेथ सर्टिफिकेशन' (BDC) को लेकर कोई विशेष पाठ्यक्रम नहीं था. केवल 10 प्रतिशत ने नियमित प्रशिक्षण मिलने की बात स्वीकार की.


अंगदान पर असर: इस कमी के कारण अंग प्रत्यारोपण पर सीधा असर पड़ रहा है. 2024 में हुए कुल अंग प्रत्यारोपण में से केवल 18 प्रतिशत ही मृत दाताओं (ब्रेन डेथ वाले) से आए थे.


क्या है 'ब्रेन डेथ' और BDC?


जब मस्तिष्क की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती तो वे काम करना बंद कर देती हैं. वेंटिलेटर के सहारे दिल के धड़कने के बावजूद भी यह स्थिति आ सकती है. 'ब्रेन डेथ' होने पर मरीज के अंग दूसरे रोगियों में प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं. इस प्रक्रिया के लिए जल्द 'ब्रेनस्टेम डेथ सर्टिफिकेशन' (BDC) की आवश्यकता होती है. BDC में देरी से रक्त संचार रुक सकता है, जिससे अंग खराब होने लगते हैं. हृदय और फेफड़े को 4 से 6 घंटे में, जबकि लिवर को 8 से 12 घंटे में निकालना जरूरी होता है.


1994 के अंग प्रत्यारोपण कानून के तहत 'ब्रेन डेथ' घोषित होने पर अंग दान किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए परिवार की सहमति भी जरूरी है. एम्स के सर्वेक्षक दल के सदस्य, डॉ. दीपक गुप्ता ने बताया कि डॉक्टरों को अंगदान की कानूनी प्रक्रिया के बारे में अधिक जागरूक होने की आवश्यकता है. साथ ही, 'ब्रेन डेथ' को प्रमाणित करने के लिए देश में कोई निश्चित प्रोटोकॉल या स्पष्ट दिशानिर्देश (गाइडलाइन) न होने के कारण भी डॉक्टरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. 


अंतिम फैसला चार डॉक्टरों का बोर्ड लेता है, जो मरीज की कुछ प्रतिक्रियाओं जैसे दर्द पर आंख न खोलना या प्रकाश पर प्रतिक्रिया न देना आदि की जांच करते हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP