क्या 'ब्रांड दीदी' के सामने ढह जाएगा बीजेपी का 'मिशन बंगाल'?
कोलकाता । डेस्क: भारत की राजनीति में जहाँ राष्ट्रीय विमर्श और केंद्रीय नेतृत्व का बोलबाला बढ़ता जा रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक ऐसी क्षेत्रीय क्षत्रप के रूप में अडिग खड़ी हैं, जिन्होंने पिछले 15 वर्षों से बार-बार अपने प्रतिद्वंद्वियों को मात दी है. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन परीक्षा साबित हो रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने इस बार 'ब्रांड ममता' को चुनौती देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. यह चुनाव मात्र सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि ममता बनर्जी की उस छवि पर एक जनमत संग्रह बन गया है, जिसे उन्होंने ज़मीनी लोकलुभावनवाद, बंगाली उप-राष्ट्रवाद और कल्याणकारी योजनाओं के मिश्रण से तैयार किया है.
सत्ता और जनता के बीच की मिटती दूरियां
ममता बनर्जी ने 'ब्रांड दीदी' को केवल शासन के माध्यम के रूप में नहीं, बल्कि जनता के साथ एक सीधे भावनात्मक जुड़ाव के रूप में स्थापित किया है. 2011 में वामपंथ के खिलाफ एक विद्रोही नेता के रूप में उभरीं ममता ने पिछले एक दशक में खुद को एक 'कल्याणकारी वास्तुकार' के रूप में ढाल लिया है. उन्होंने राज्य की शक्ति और आम नागरिक के बीच की दूरी को इस तरह कम किया है कि सरकारी नीतियां व्यक्तिगत पहुंच का हिस्सा बन गई हैं. 2021 के चुनावों में यह मॉडल अपने शिखर पर था, जब तृणमूल कांग्रेस ने 48.5% वोट शेयर के साथ 215 सीटें जीती थीं. हालांकि, बीजेपी ने भी 38.4% वोट शेयर के साथ 77 सीटें जीतकर अपनी जड़ें गहरी कर ली थीं. अब पांच साल बाद, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह भावनात्मक और भौतिक जुड़ाव अभी भी बरकरार है.
ममता का 'मातृत्व कल्याण' मॉडल और चुनावी गणित
ममता बनर्जी की राजनीति के केंद्र में एक ऐसी शासन व्यवस्था है जो दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे के बजाय घरेलू नकदी (लिक्विडिटी) को प्राथमिकता देती है. 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाएं इस मॉडल की रीढ़ बन चुकी हैं. लगभग 2.21 करोड़ महिलाओं को मिलने वाली मासिक सहायता राशि, जिसे अब सामान्य वर्ग के लिए 1,500 रुपये और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए 1,700 रुपये कर दिया गया है, ने एक ऐसा समर्थन आधार तैयार किया है जो जाति और धर्म की सीमाओं को लांघ जाता है. इसके अलावा, 'खाद्य साथी' और 'दुआरे राशन' के माध्यम से करीब 9 करोड़ लोगों तक पहुँचने वाला राशन नेटवर्क ममता सरकार की उपस्थिति को हर घर के चूल्हे तक पहुँचाता है. यह मॉडल तमिलनाडु में जे. जयललिता की 'अम्मा' पहल की याद दिलाता है, जिसने वहां की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था.
सड़क से अदालत तक: स्ट्रीट फाइटर की नई छवि
चुनावों की घोषणा से ठीक पहले ममता बनर्जी ने अपनी 'स्ट्रीट फाइटर' वाली छवि को बड़ी चतुराई से पुनर्जीवित किया. जब उन पर संस्थागत दबाव और सत्ता विरोधी लहर का आरोप लगा, तो उन्होंने संघर्ष के मैदान को सड़कों से हटाकर अदालत की चौखट तक पहुँचा दिया. फरवरी में सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर उन्होंने एक कानूनी सुनवाई को राजनीतिक अवसर में बदल दिया. मतदाता सूची से 90 लाख से अधिक नामों को हटाए जाने के मुद्दे पर उन्होंने खुद को एक 'संवैधानिक योद्धा' के रूप में पेश किया. सूती साड़ी और हवाई चप्पल में सजी ममता ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे उन आम नागरिकों के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं, जिन्हें व्यवस्था से बाहर करने की साजिश रची जा रही है.
भ्रष्टाचार और विश्वसनीयता का संकट
इतने वर्षों के शासन के बाद, इस बार ब्रांड दीदी पर दबाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. 2026 के इस चुनावी चक्र ने टीएमसी के भीतर गहरे असंतोष और नैतिक संकट को उजागर किया है. आरजी कर मेडिकल कॉलेज की दुखद घटना और संदेशखाली के आरोपों ने ममता बनर्जी के मूल नारे 'मां, माटी, मानुष' पर ही प्रहार किया है. बीजेपी ने इस मौके का फायदा उठाते हुए ममता की छवि को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया है जो महिलाओं की सुरक्षा करने में विफल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में सीधे तौर पर आरोप लगाया कि टीएमसी के शासन में 'मां' रो रही है और 'माटी' सिंडिकेट के हवाले कर दी गई है. आरजी कर पीड़िता की माँ को चुनाव मैदान में उतारकर बीजेपी ने इस भावनात्मक मुद्दे को और हवा दी है.
पहचान की राजनीति और ध्रुवीकरण का खेल
इस बार का चुनाव पहचान की राजनीति और नागरिकता के सवालों के इर्द-गिर्द सिमट गया है. मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुए सुधार और नामों के हटने को ममता बनर्जी ने 'अस्तित्व की लड़ाई' करार दिया है. उन्होंने इसे अल्पसंख्यकों और वंचितों को बाहर करने की एक साजिश के रूप में पेश किया है, जिससे उनके आधार वोट बैंक में लामबंदी तेज हुई है. पहले चरण में हुए रिकॉर्ड 92.59% मतदान को टीएमसी अपनी जीत का संकेत मान रही है, जबकि बीजेपी इसे अवैध घुसपैठ के खिलाफ और बदलाव के पक्ष में जनता का आक्रोश बता रही है. यह चुनाव अब केवल विकास का नहीं, बल्कि 'बंगाली बनाम बाहरी' और 'पहचान बनाम सुरक्षा' की जंग बन चुका है.
टीएमसी के पास अब भी है बढ़त की उम्मीद
तमाम चुनौतियों के बावजूद ममता बनर्जी के पास कुछ ऐसे लाभ हैं जिन्हें कम करके नहीं आंका जा सकता. पहला, बीजेपी के पास राज्य स्तर पर ममता के कद का कोई स्थानीय चेहरा नहीं है, जिससे टीएमसी को 'बंगाल की बेटी' बनाम 'बाहरी ताकत' का नैरेटिव सेट करने में आसानी होती है. दूसरा, टीएमसी का 'आनंदधारा' जैसे स्वयं सहायता समूहों का विशाल नेटवर्क ज़मीनी स्तर पर पार्टी को मज़बूती प्रदान करता है. तीसरा, ममता की संकट के समय खुद को बदलने की क्षमता बेजोड़ है. 'श्रमश्री' जैसी नई योजनाएं लाकर उन्होंने प्रवासी श्रमिकों के गुस्से को शांत करने की कोशिश की है. यह अनुकूलन क्षमता ही उन्हें सत्ता विरोधी लहर के बीच भी प्रासंगिक बनाए रखती है.
2026 का नया ब्रांड और दिल्ली का सपना
2026 की ममता बनर्जी 2011 की परिवर्तनवादी या 2021 की आक्रामक नेता से अलग हैं. अब उनका ब्रांड पूरी तरह से 'कल्याणकारी उपयोगिता' और बीजेपी विरोधी राष्ट्रीय चेहरे के रूप में विकसित हो चुका है. ममता ने स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल की जीत उनके लिए दिल्ली के रास्ते खोलेगी. वे खुद को एक ऐसे राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रही हैं जो बीजेपी को केंद्र से बेदखल करने के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट कर सकती है. पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है और दूसरे चरण की तैयारी है. 4 मई को आने वाले परिणाम यह तय करेंगे कि क्या ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी कर एक नया इतिहास रचेंगी या बीजेपी का 'मिशन सोनार बांग्ला' सफल होगा. फिलहाल, बंगाल की राजनीति में 'दीदी' अभी भी डटकर मुकाबला कर रही हैं.