क्या IEA द्वारा घोषित 400 मिलियन बैरल तेल दुनिया के देशों तक पहुंच पायेगा?
नई दिल्ली । डेस्क: पश्चिम एशिया में छिड़े भीषण युद्ध और ईरान द्वारा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' की पूर्ण नाकेबंदी के बीच अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने अपने इतिहास के सबसे बड़े आपातकालीन तेल भंडार को खोलने का निर्णय लिया है. 400 मिलियन बैरल कच्चे तेल की यह विशाल निकासी वैश्विक ऊर्जा बाजार को शांत करने के लिए एक 'मास्टरस्ट्रोक' मानी जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत और सैन्य स्थिति ने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या यह तेल वास्तव में दुनिया के उन देशों तक पहुंच पाएगा जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों और सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद, तेहरान ने जवाबी कार्रवाई में दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल धमनी को बंद कर दिया है. प्रति दिन 20 मिलियन बैरल से अधिक तेल के परिवहन वाले इस रास्ते के बंद होने से वैश्विक आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह ठप हो गया है.
आईईए के सदस्य देशों, विशेष रूप से अमेरिका, ने अपने रणनीतिक भंडार से 172 मिलियन बैरल तेल निकालने की घोषणा की है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि ईरान ने होर्मुज के रास्ते में जहाजों पर हमले जारी रखे, तो यह तेल केवल कागजों और स्थानीय पाइपलाइनों तक ही सीमित रह जाएगा.
ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखें तो आईईए का यह कदम एक 'बैंड-एड' की तरह है जो गहरे जख्म को भरने की कोशिश कर रहा है. चैथम हाउस के फेलो नील क्विलियम और अन्य विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि रणनीतिक भंडार से तेल निकालना एक 'वन-शॉट' समाधान है.
समस्या यह है कि अमेरिका और यूरोप के पास मौजूद तेल भंडार मुख्य रूप से उनके अपने महाद्वीपों में स्थित हैं. भारत और जापान जैसे एशियाई देशों के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए पूरी तरह खाड़ी देशों और समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं, यह भंडार तभी उपयोगी होगा जब उसे सुरक्षित रूप से जहाजों के जरिए भेजा जा सके.
वर्तमान में ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के सख्त रुख और उनके द्वारा "एक लीटर तेल भी पास न होने देने" की धमकी ने समुद्री सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है.
अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने स्वीकार किया है कि इस तेल को बाजार में पूरी तरह उतारने में 120 दिन लगेंगे और वास्तविक डिलीवरी शुरू होने में कम से कम 13 दिन का समय लगेगा. यदि तेल को एशिया भेजना पड़ा, तो युद्ध की स्थिति में जहाजों को लंबा रास्ता तय करना होगा, जिससे यह रसद मई के मध्य तक ही पहुंच पाएगी.
इसके अलावा, तेल की गुणवत्ता का मुद्दा भी एक बड़ी बाधा है; अमेरिका के पास 'सौर' (Sour) कच्चे तेल का बड़ा भंडार है, जिसे रिफाइन करने की क्षमता हर देश के पास नहीं है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला और जटिल हो जाती है.
रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक होर्मुज जलडमरूमध्य का गतिरोध समाप्त नहीं होता, तब तक 400 मिलियन बैरल की यह निकासी केवल एक मनोवैज्ञानिक सांत्वना है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ मक्सिम सोनिन के अनुसार, तेल के अणु तेजी से चलते हैं लेकिन बाजार की रसद उतनी ही धीमी होती है. यदि ईरान के हमलों के डर से टैंकर बीमा कंपनियां सुरक्षा देने से इनकार कर देती हैं या टैंकरों पर हमले जारी रहते हैं, तो आईईए के भंडार से निकला तेल बंदरगाहों पर ही सड़ता रहेगा.
अमेरिका ने रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील देकर 100 मिलियन बैरल रूसी तेल को बाजार में लाने का प्रयास किया है, लेकिन यह भी समुद्र में फंसे जहाजों की सुरक्षा पर निर्भर है. अंततः, वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह एक उच्च-जोखिम वाली स्थिति है जहाँ तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने का खतरा मंडरा रहा है.
आईईए की यह घोषणा बाजार को एक सकारात्मक संकेत जरूर दे रही है, लेकिन भौतिक रूप से तेल की पहुंच युद्ध के मैदान में होने वाले फैसलों और होर्मुज की घेराबंदी टूटने पर ही निर्भर करेगी. बिना सुरक्षित समुद्री मार्ग के, दुनिया के ऊर्जा संकट का समाधान केवल भंडार खोलने से संभव नहीं दिखता.