क्या ट्रंप की ज्यादतियों के चलते बाब अल-मंडेब भी बंद होगा?
नई दिल्ली । डेस्क: मध्य पूर्व में युद्ध की ज्वाला अब एक ऐसे मुकाम पर पहुँच गई है जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था के अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं. जिस तरह से अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आक्रामक रुख अख्तियार किया है, उसने न केवल कूटनीति के रास्तों को बंद किया है बल्कि जवाबी कार्रवाई की एक ऐसी शृंखला को जन्म दे दिया है जो पूरी दुनिया को अंधेरे में धकेल सकती है.
ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के वरिष्ठ सलाहकार अली अकबर विलायती की हालिया चेतावनी कि ईरान के सहयोगी 'बाब अल-मंडेब' जलमार्ग को भी उसी तरह बंद कर सकते हैं जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य को किया गया है, इसी बढ़ते तनाव का सीधा परिणाम है.
ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान के बिजली संयंत्रों, पुलों और यहाँ तक कि पानी के डिसेलिनेशन प्लांटों पर बमबारी करने की धमकियाँ किसी भी संप्रभु राष्ट्र को दीवार से लगाने जैसी हैं. जब किसी राष्ट्र के अस्तित्व और उसके नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं पर प्रहार किया जाता है, तो क्रिया की प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है.
विलायती का यह कहना कि 'प्रतिरोध का मोर्चा' बाब अल-मंडेब को भी होर्मुज की तरह ही देखता है, एक स्पष्ट संकेत है कि यदि ईरान पर सीधे हमले बढ़ते हैं, तो वह अपने सहयोगियों, विशेषकर यमन के हूतियों के माध्यम से वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा को काट देगा.
बाब अल-मंडेब और होर्मुज, ये दोनों जलमार्ग दुनिया के ऊर्जा व्यापार के फेफड़े हैं. होर्मुज से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है और बाब अल-मंडेब से करीब 5 प्रतिशत. यदि ट्रंप की ज्यादतियों के कारण ये दोनों मार्ग बंद होते हैं, तो दुनिया की एक-चौथाई तेल और गैस आपूर्ति ठप हो जाएगी.
यह केवल सांख्यिकी का खेल नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर दुनिया के हर घर की रसोई, हर कारखाने और हर पेट्रोल पंप पर पड़ेगा. हूतियों ने पहले भी दिखाया है कि वे अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर लाल सागर में जहाजों का आवागमन रोकने में सक्षम हैं.
ट्रंप द्वारा युद्ध भड़काने वाली भाषा का इस्तेमाल करना आग में घी डालने जैसा है. शांति स्थापित करने की कोशिशों के बजाय बिजली संयंत्रों को उड़ाने की बात करना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पतन को दर्शाता है. ईरान ने स्पष्ट किया है कि होर्मुज उन देशों के लिए खुला है जो बातचीत के माध्यम से रास्ता चाहते हैं, लेकिन अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों और हमलों की धमकियों ने संवाद के सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं.
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता यह है कि युद्ध को जानबूझकर भड़काया जा रहा है. जब ईरान पर चौतरफा दबाव बढ़ेगा और उसके बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया जाएगा, तो वह चुप नहीं बैठेगा. हूतियों के माध्यम से बाब अल-मंडेब को बंद करवाना ईरान का वह 'ब्रह्मास्त्र' है जो वैश्विक बाजार में हाहाकार मचा सकता है.
सऊदी अरब, जिसने होर्मुज के बंद होने के बाद अपनी 'ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन' के जरिए तेल निर्यात का विकल्प निकाला था, अब वह भी असुरक्षित हो गया है क्योंकि यह पाइपलाइन लाल सागर तक ही जाती है जहाँ हूतियों का प्रभाव है.
यह समझना अनिवार्य है कि युद्ध में जीत चाहे किसी की भी हो, हार हमेशा मानवता की होती है. बमबारी से बुनियादी ढांचे नष्ट होते हैं, लेकिन आर्थिक नाकेबंदी से मासूम जनता का जीवन दूभर हो जाता है.
वक्त की मांग है कि ईरान पर हमलों की बयानबाजी को तुरंत बंद किया जाए और शांति की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं. यदि उकसावे की यह राजनीति जारी रही, तो बाब अल-मंडेब का बंद होना केवल समय की बात रह जाएगी, जिसके परिणाम स्वरूप होने वाले वैश्विक आर्थिक पतन की जिम्मेदारी पूरी तरह से उन शक्तियों पर होगी जिन्होंने कूटनीति के ऊपर युद्ध को प्राथमिकता दी.
मानवता को बचाने के लिए अब धमाकों की नहीं, संवाद की जरूरत है.