ईरान पुनर्निर्माण के लिए $300 बिलियन का फंड कौन देगा ?
नई दिल्ली । डेस्क: वाशिंगटन और तेहरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष विराम समझौते में 300 अरब अमेरिकी डॉलर का पुनर्निर्माण कोष एक बड़े विवाद के रूप में सामने आया है. 100 से अधिक दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान द्वारा हस्ताक्षरित 14 सूत्रीय समझौता ज्ञापन (MOU) में इस फंड की रूपरेखा तैयार की गई है. इस समझौते के तहत वाशिंगटन ने ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक सुधार के लिए क्षेत्रीय भागीदारों के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई है.
हालांकि, इस भारी-भरकम राशि के योगदान और आवंटन को लेकर समझौते में कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया है, जिसने इस बात पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर इस युद्ध की कीमत कौन चुकाएगा.
इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने वाशिंगटन को किसी भी सीधे वित्तीय उत्तरदायित्व से दूर रखने की कोशिशें तेज कर दी हैं. पेरिस के पास पैलेस ऑफ वर्साय में ग्रुप ऑफ सेवन (G7) शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते पर बोलते हुए ट्रम्प ने साफ किया कि अमेरिका इस फंड में कोई निवेश नहीं करेगा.
इसके साथ ही उन्होंने उन खबरों को भी खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि अमेरिका ने खाड़ी देशों पर इस फंड में योगदान देने के लिए दबाव डाला है.
ट्रम्प ने इस बात को भी सिरे से नकार दिया कि अमेरिका ईरान को किसी भी तरह का भुगतान करेगा और 300 मिलियन डॉलर के अमेरिकी वित्त पोषित पैकेज की रिपोर्टों को 'फेक न्यूज' करार दिया.
हालांकि, ट्रम्प का यह बयान अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस के उस बयान के विपरीत नजर आता है, जिसमें वेंस ने कहा था कि यदि तेहरान समझौते के तहत अपनी शर्तों को पूरा करता है, तो उसे 'गल्फ कोस्ट कोएलिशन' समर्थित पुनर्निर्माण कोष तक पहुंच मिल सकती है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस योजना में स्पष्टता की कमी से खाड़ी देशों में चिंता बढ़ेगी, क्योंकि उनसे एक ऐसे युद्ध के बाद के सुधार प्रयासों के लिए धन देने की उम्मीद की जा रही है, जिसमें उनकी भूमिका बेहद सीमित थी.
जानकारों के अनुसार, समझौता ज्ञापन की वार्ताओं में बड़े पैमाने पर किनारे किए जाने के बाद खाड़ी देश वाशिंगटन के इस ढांचे को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे और वे ईरान के प्रति अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण की तलाश करेंगे.
खाड़ी देशों द्वारा कोई भी वित्तीय योगदान वाशिंगटन के नेतृत्व वाले ढांचे के बजाय सीधे तेहरान से जुड़ी सख्त शर्तों के साथ आ सकता है. बिना किसी ठोस सुरक्षा गारंटी के खाड़ी देशों से पुनर्निर्माण के लिए धन मांगना वाशिंगटन के साथ उनके दीर्घकालिक संबंधों में खटास पैदा कर सकता है.
यह ऐतिहासिक समझौता केवल पुनर्निर्माण के वित्तपोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लेबनान सहित सभी मोर्चों पर तत्काल और स्थायी संघर्ष विराम के साथ-साथ दोहरे अवरोधों और ईरानी पारगमन शुल्कों को समाप्त करने के प्रावधान भी शामिल हैं.
वाशिंगटन ने तेहरान पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाने और ईरानी संपत्तियों को फ्रीज से मुक्त करने की प्रतिबद्धता भी जताई है. जानकारों का कहना है कि यह पुनर्निर्माण कोष वाशिंगटन द्वारा जल्द से जल्द संघर्ष विराम सुरक्षित करने के लिए दिया गया एक प्रलोभन मात्र है, जिसकी व्यवहार्यता पर बड़े सवालिया निशान हैं.
इसकी तुलना ट्रम्प प्रशासन की पिछली 'पीस टू प्रॉस्पेरिटी' पहल से की जा रही है, जो कभी हकीकत नहीं बन सकी. आलोचकों का मानना है कि इस योजना का उद्देश्य युद्ध की लागत को कम करना और इसका वित्तीय बोझ अन्य देशों पर डालना है, जिससे खाड़ी देशों और ईरान के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग में दरार आ सकती है.