ईरान की सैन्य रणनीति क्या है? क्या खाड़ी क्षेत्र में महायुद्ध छिड़ेगा?
तेहरान । डेस्क: मध्य पूर्व इस समय बारूद के ढेर पर बैठा है. शनिवार को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौत ने पूरे क्षेत्र में प्रतिशोध की ज्वाला भड़का दी है. ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस 'अपूरणीय क्षति' का बदला लेने के लिए किसी भी हद तक जाएगा. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ईरान की सैन्य शक्ति इतनी सक्षम है कि वह दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों का मुकाबला कर सके?
समानांतर सेना और जटिल सैन्य ढांचा
ईरान की सैन्य शक्ति को समझना दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों के लिए हमेशा से एक चुनौती रहा है. ईरान का सैन्य तंत्र 'अपारदर्शी और जटिल' माना जाता है. यहाँ दो समानांतर सेनाएं काम करती हैं, जो सीधे सर्वोच्च नेता को रिपोर्ट करती हैं:
अर्तश (Artesh): यह ईरान की नियमित सेना है, जिसका मुख्य कार्य देश की क्षेत्रीय अखंडता, सीमाओं की रक्षा और पारंपरिक युद्ध लड़ना है.
आईआरजीसी (IRGC): इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स का काम केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ईरान के राजनीतिक ढांचे की सुरक्षा भी करता है. आईआरजीसी के पास ही ईरान का सबसे घातक ड्रोन और मिसाइल बेड़ा है.
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, यह दोहरा ढांचा इसलिए बनाया गया है ताकि देश को न केवल बाहरी दुश्मनों से, बल्कि आंतरिक तख्तापलट जैसी स्थितियों से भी बचाया जा सके.
नई रणनीति: 'आक्रामक विषम युद्ध' (Aggressive Asymmetric Warfare)
पिछले साल जून 2025 में इजरायल के साथ हुए 12 दिवसीय युद्ध के बाद ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान अब केवल बचाव नहीं, बल्कि 'आक्रामक विषम रणनीति' पर काम कर रहा है. इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
मिसाइल सिटी: ईरान ने जमीन के नीचे मिसाइलों का जाल बिछा रखा है, जिन्हें 'मिसाइल सिटी' कहा जाता है. इनका मकसद पहले हमले में अपनी मारक क्षमता को बचाए रखना और फिर भीषण जवाबी हमला करना है.
क्षेत्रीय संतृप्ति: ईरान एक साथ सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागकर इजरायल और अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे आयरन डोम) को थका देने की रणनीति अपनाता है.
प्रॉक्सि वॉर: हिजबुल्ला और अन्य मिलिशिया समूहों के जरिए ईरान लेबनान और अन्य मोर्चों से इजरायल को घेरने की कोशिश करता है.
आर्थिक हथियार: होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी
ईरान केवल मिसाइलों से नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के जरिए भी दबाव बना रहा है. दुनिया का 20 से 30 प्रतिशत तेल और गैस 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' से होकर गुजरता है. ईरान ने इस समुद्री मार्ग को बंद करने की धमकी दी है. हालिया आंकड़ों के अनुसार, कम से कम 150 तेल टैंकर इस समय खाड़ी के खुले पानी में लंगर डाले खड़े हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहराने का डर पैदा हो गया है.
जून 2025 बनाम वर्तमान संघर्ष: क्या बदला है?
जून 2025 के युद्ध में अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों (नतंज, फोरडो और इस्फहान) पर हमला कर उन्हें 'तटस्थ' करने का दावा किया था. उस समय की तुलना में, आज का ईरान अधिक 'जोखिम लेने वाला' हो गया है.
रक्षा विशेषज्ञ जॉन फिलिप्स के अनुसार, "2025 का युद्ध परोक्ष युद्ध से हटकर सीधा टकराव था. आज ईरान अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए और भी अधिक आक्रामक हो गया है, हालांकि उसकी क्षमताएं प्रतिबंधों और आंतरिक अस्थिरता के कारण कुछ कमजोर जरूर हुई हैं."
क्या ईरान लंबे समय तक टिक पाएगा?
ईरान की सबसे बड़ी ताकत उसके सस्ते ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिन्हें वह प्रतिबंधों के बावजूद अपने 'अंडरग्राउंड' कारखानों में बना सकता है. वह सालों तक रुक-रुक कर हमले जारी रखने की क्षमता रखता है.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाला उच्च-तीव्रता वाला युद्ध ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह तबाह कर सकता है और शासन के खिलाफ आंतरिक विद्रोह को जन्म दे सकता है.
अमेरिका और इजरायल का रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को 'अब तक की सबसे बड़ी ताकत' से कुचलने की चेतावनी दी है. फरवरी से अब तक अमेरिका ने मध्य पूर्व में 120 से अधिक विमान तैनात किए हैं, जो 2003 के इराक युद्ध के बाद सबसे बड़ी तैनाती है. इसमें F-35 और F-22 जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान शामिल हैं.
दूसरी ओर, इजरायल के पास तकनीक की श्रेष्ठता है, लेकिन उस पर भी घरेलू दबाव और लंबे युद्ध की आर्थिक लागत का बोझ बढ़ रहा है.
ईरान फिलहाल एक 'घायल जानवर' की तरह व्यवहार कर रहा है. अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद, ईरान का लक्ष्य अब केवल युद्ध जीतना नहीं, बल्कि अपनी सैन्य धमक को फिर से स्थापित करना है. आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि क्या कूटनीति की कोई गुंजाइश बची है या दुनिया एक और विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध की गवाह बनेगी.