UAE के OPEC, OPEC+ छोड़ने का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
दुबई । डेस्क: वैश्विक तेल बाजार में उस समय एक बड़ा भूचाल आ गया जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) और व्यापक OPEC+ गठबंधन से अलग होने की ऐतिहासिक घोषणा की. 1 मई से प्रभावी होने वाले इस फैसले ने न केवल ऊर्जा जगत को चौंका दिया है, बल्कि दशकों पुरानी खाड़ी एकता पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह निर्णय देश की भविष्य की ऊर्जा रणनीतियों और राष्ट्रीय हितों की गहन समीक्षा के बाद लिया गया है. लेकिन इस अलगाव की गहराई में उत्पादन सीमाओं को लेकर लंबे समय से जारी खींचतान और बदलती वैश्विक भू-राजनीति छिपी है.
यूएई के इस कदम के पीछे सबसे प्रमुख कारण उत्पादन कोटा को लेकर उसकी असंतुष्टि है. वर्षों से यूएई अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि ओपेक द्वारा निर्धारित सीमाएं यूएई की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं के आड़े आ रही थीं.
दुबई स्थित परामर्श फर्म कमर एनर्जी के अनुसार, ओपेक ने यूएई के उत्पादन को लगभग 32 लाख बैरल प्रतिदिन तक सीमित कर रखा था, जबकि हकीकत में उसकी क्षमता 50 लाख बैरल प्रतिदिन के करीब पहुंच चुकी है. अपनी पूरी क्षमता का उपयोग न कर पाना यूएई के लिए एक बड़ा वित्तीय नुकसान साबित हो रहा था.
विश्लेषकों का तर्क है कि यूएई अब उत्पादन में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि करना चाहता है, जो ओपेक के ढांचे के भीतर रहते हुए लगभग असंभव था.
सऊदी अरब के साथ बढ़ता कूटनीतिक तनाव
यूएई का यह "संप्रभु" निर्णय सऊदी अरब के साथ उसके पुराने मतभेदों की परिणति माना जा रहा है. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक रणनीतिक फैसला बताया गया है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि कोटा प्रबंधन प्रणाली को लेकर रियाद और अबू धाबी के बीच का घर्षण अब एक संरचनात्मक बाधा बन चुका था.
जहां सऊदी अरब कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उत्पादन में कटौती पर जोर देता रहा है, वहीं यूएई अपनी अतिरिक्त क्षमता का लाभ उठाकर राजस्व अधिकतम करना चाहता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो के शोधकर्ताओं के अनुसार, यह कदम इस बात का संकेत है कि अब खाड़ी देशों की 'एकीकृत तेल नीति' का दौर समाप्त हो रहा है और राष्ट्र अब सामूहिक हित के बजाय अपने व्यक्तिगत आर्थिक लक्ष्यों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
वैश्विक बाजार और ओपेक के प्रभाव पर चोट
एक प्रमुख तेल उत्पादक के रूप में यूएई का बाहर निकलना ओपेक की बाजार शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर करेगा. आंकड़ों के अनुसार, यूएई के जाने से वैश्विक आपूर्ति पर ओपेक का नियंत्रण लगभग 30 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत रह जाएगा. यह गिरावट मामूली लग सकती है, लेकिन बाजार की स्थिरता के लिए यह विनाशकारी हो सकती है.
वर्तमान में सऊदी अरब और यूएई ही ऐसे देश थे जिनके पास पर्याप्त 'स्पेयर कैपेसिटी' (अतिरिक्त उत्पादन क्षमता) थी. यूएई के हटने के बाद, वैश्विक तेल संकट की स्थिति में आपूर्ति को संतुलित करने का भार अकेले सऊदी अरब पर आ जाएगा.
बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि इससे आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों में भारी अस्थिरता देखने को मिल सकती है, जिससे वैश्विक मुद्रास्फीति पर भी दबाव बढ़ेगा.
आर्थिक विविधीकरण और भविष्य की रणनीति
यूएई की इस रणनीति का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू 'ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन' यानी स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता झुकाव है. अबू धाबी को इस बात का आभास है कि भविष्य में जीवाश्म ईंधन की मांग कम हो सकती है.
ऐसे में, वैश्विक मांग घटने से पहले यूएई अधिक से अधिक तेल बेचकर भारी राजस्व जुटाना चाहता है. इस राजस्व का उपयोग वह अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से मुक्त करने और घरेलू आर्थिक परिवर्तन को गति देने के लिए करना चाहता है.
फुजैराह बंदरगाह का रणनीतिक उपयोग, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के तनावों से काफी हद तक सुरक्षित है, यूएई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक स्वतंत्र और लचीला खिलाड़ी के रूप में स्थापित करेगा. कुल मिलाकर, यूएई का ओपेक छोड़ना केवल एक सदस्यता का त्याग नहीं है, बल्कि एक नए ऊर्जा युग की शुरुआत है जहां राष्ट्रीय लाभ कूटनीतिक एकजुटता से ऊपर है.