इतिहास को केवल संघर्ष के नजरिए से देखना गलत: शशि थरूर
नई दिल्ली । डेस्क: भारतीय इतिहास के संकुचित चित्रण और समुदायों के बीच केवल संघर्ष की कहानियों को पेश करने की कोशिशों पर सांसदों और विद्वानों ने गहरी चिंता जताई है. शनिवार को 'इंडियन हिस्ट्री फोरम' द्वारा आयोजित एक सेमिनार में वक्ताओं ने कहा कि भारत का अतीत केवल युद्धों का नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मिलन और समन्वय का रहा है, जिसे आज की पीढ़ी के सामने सही ढंग से नहीं रखा जा रहा है.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि भारत कभी भी एक अखंड (मोनोलिथिक) संस्कृति वाला देश नहीं रहा. उन्होंने कुतुब कॉम्प्लेक्स, हुमायूं का मकबरा और ताजमहल जैसे वास्तुशिल्प का उदाहरण देते हुए कहा कि ये इमारतें एक ऐसी सभ्यता का प्रमाण हैं, जो आपस में संवाद करती रही है.
थरूर ने चेतावनी दी कि इतिहास को केवल चुनिंदा संघर्षों के नजरिए से देखना वास्तविक इतिहास को समझने के अवसर को खोने जैसा है.
संगोष्ठी में राज्यसभा सांसद मनोज झा ने सामाजिक ताने-बाने में आती गिरावट पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि आज के समाज में गांधी और नेहरू जैसी शख्सियतों का उभरना मुश्किल है जो धर्मनिरपेक्षता और साझा विरासत के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध थे.
वहीं, विद्वान एस. सादतुल्लाह हुसैनी और शादाब मूसा ने कहा कि मुस्लिम शासकों ने भारत के संसाधनों को लूटने के बजाय यहाँ बसकर व्यापार, संस्कृति और शिक्षा में अभूतपूर्व योगदान दिया.
वक्ताओं ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में मध्यकालीन भारत के चित्रण पर भी सवाल उठाए. उनका आरोप है कि इतिहास को 'आक्रमणकारी' और 'जजिया' जैसे शब्दों के इर्द-गिर्द समेटकर उसे एकपक्षीय बनाया जा रहा है.
इसके साथ ही, मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका की भी आलोचना की गई. लेखक अशोक कुमार पांडे और कांग्रेस नेता गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही भ्रामक सूचनाओं का मुकाबला केवल सही और तथ्यात्मक जानकारी साझा करके ही किया जा सकता है. सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की 'गंगा-जमुनी तहजीब' और साझा विरासत को मुख्यधारा की चर्चा में वापस लाना अनिवार्य है.