US Special 301 Report: भारत पर दबाव बनाने की रणनीति
सीजीखबर डेस्क । रायपुर: अमेरिका ने एक बार फिर भारत को अपनी वार्षिक बौद्धिक संपदा (आईपी) रिपोर्ट में 'प्रायोरिटी वॉच लिस्ट' (प्राथमिकता निगरानी सूची) में डाल दिया है. अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) द्वारा जारी इस 2026 की स्पेशल 301 रिपोर्ट में भारत के साथ चिली, चीन, इंडोनेशिया, रूस और वेनेजुएला जैसे छह देशों को शामिल किया गया है. यह रिपोर्ट मुख्य रूप से इस बात की समीक्षा करती है कि अमेरिका के व्यापारिक साझेदार देश पेटेंट, कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसे अधिकारों की सुरक्षा कितनी कड़ाई से कर रहे हैं.
हालांकि, इस रिपोर्ट का भारत पर कोई सीधा कानूनी असर या जुर्माना नहीं होगा, लेकिन इसे भारत पर दबाव बनाने की एक प्रशासनिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. विशेष रूप से अमेरिकी दवा कंपनियों के व्यापारिक हितों को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका अक्सर इस तरह के कदम उठाता रहा है.
इस ताजा रिपोर्ट में अमेरिकी एजेंसी ने माना है कि भारत ने बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में सराहनीय प्रगति की है, लेकिन साथ ही कई पुराने मुद्दों को लेकर चिंता भी जताई है. रिपोर्ट में भारतीय पेटेंट प्रणाली में होने वाली देरी, सख्त नियमों के कारण आवेदनों का खारिज होना और पेटेंट रद्द होने की संभावनाओं को कमियों के तौर पर गिनाया गया है.
इसके अलावा, अमेरिका ने भारत में नकली सामानों की बिक्री, पायरेसी, विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल की कमी और विदेशी उत्पादों पर लगने वाले उच्च आयात शुल्क को भी मुद्दा बनाया है. अमेरिकी सरकार का दावा है कि भारत में व्यापारिक रहस्यों और परीक्षण डेटा की सुरक्षा के लिए अभी भी पर्याप्त कानूनी प्रावधान नहीं हैं, जिससे उनकी कंपनियों को नुकसान होता है.
लेकिन दूसरी तरफ, भारतीय विशेषज्ञों और उद्योग जगत का मानना है कि अमेरिकी प्रशासन ने इस रिपोर्ट को तैयार करते समय भारत द्वारा पिछले कुछ वर्षों में किए गए बड़े सुधारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है. साफ तौर पर दिखाई देता है कि बड़ी अमेरिकी दवा कंपनियों के इशारे पर भारतीय स्वास्थ्य और कानूनी प्रणाली को निशाना बनाया जा रहा है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका लंबे समय से भारतीय पेटेंट कानून की धारा 3(डी) का विरोध करता रहा है. जबकि हकीकत यह है कि यह धारा केवल 'एवरग्रेनिंग' यानी पुरानी दवाओं में मामूली बदलाव करके उनका पेटेंट बढ़ाने की चालाकी को रोकती है. भारत का यह नियम आम जनता को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए बेहद जरूरी है ताकि गरीब मरीज भी अपना इलाज करा सकें.
अमेरिका ने भारत के 'अनिवार्य लाइसेंसिंग' नियमों पर भी आपत्ति जताई है और कहा है कि इससे विदेशी कंपनियों में अनिश्चितता का माहौल बनता है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भारत ने इतिहास में केवल एक बार (बायर कॉरपोरेशन बनाम नैटको फार्मा मामले में) इस नियम का इस्तेमाल किया है, जो यह साबित करता है कि भारत ने इस अधिकार का कभी दुरुपयोग नहीं किया बल्कि बेहद संयम से काम लिया है.
अमेरिका की एक और बड़ी शिकायत 'डेटा एक्सक्लूसिविटी' की कमी को लेकर है. अमेरिका चाहता है कि उसकी कंपनियों द्वारा किए गए क्लिनिकल ट्रायल के डेटा का इस्तेमाल भारतीय जेनरिक दवा कंपनियां न कर पाएं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के ट्रिप्स समझौते में ऐसा कोई नियम अनिवार्य नहीं है. अगर भारत इसे मान लेता है, तो देश में सस्ती जेनरिक दवाएं समय पर नहीं बन पाएंगी और दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी.
भारत की कानूनी और पेटेंट व्यवस्था पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और यह किसी भी तरह से अमेरिकी कंपनियों को निष्पक्ष बाजार पहुंच देने से मना नहीं करती है. ऐसे में स्पष्ट है कि तेजी से तरक्की कर रहे भारत को इस सूची में बनाए रखना केवल एक राजनीतिक और आर्थिक दबाव की रणनीति है.
भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और उसे अपनी गरीब जनता के स्वास्थ्य हितों की रक्षा करने का पूरा अधिकार है. जानकारों का कहना है कि भारत को अमेरिका के इस तरह के किसी भी एकतरफा दबाव या धमकी के आगे झुकने की बिल्कुल जरूरत नहीं है और देश को अपनी स्वतंत्र लोक-कल्याणकारी नीतियों पर मजबूती से टिके रहना चाहिए.