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अमेरिकी अदालत ने ट्रंप के 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ को भी किया रद्द

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08 मई 2026, 07:58 AM 3 मिनट में पढ़ें 2

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वॉशिंगटन । डेस्क: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों को एक और कड़े कानूनी झटके का सामना करना पड़ा है. अमेरिकी फेडरल कोर्ट (कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड) ने ट्रंप द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत के वैश्विक टैरिफ को "अमान्य" और "कानून द्वारा अनधिकृत" करार देते हुए रद्द कर दिया है. 


यह फैसला भारत समेत उन तमाम देशों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिन पर 24 फरवरी को ये आयात शुल्क लागू किए गए थे. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रेड एक्ट 1974 की जिन धाराओं का हवाला देकर ये टैरिफ लगाए गए थे, उनका उपयोग केवल 'भुगतान संतुलन' (Balance of Payment) के संकट की स्थिति में ही किया जा सकता है.

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बहुमत के फैसले में जजों ने कहा कि सरकार द्वारा कानून की इतनी व्यापक व्याख्या राष्ट्रपति को असीमित शक्तियाँ दे देगी, जो संवैधानिक रूप से केवल कांग्रेस के पास हैं. 


अदालत ने पाया कि राष्ट्रपति के उद्घोषणा पत्र में उन आवश्यक शर्तों का उल्लेख नहीं था जो इस तरह के शुल्क लगाने के लिए अनिवार्य हैं. 


हालांकि, जज टिमोथी सी. स्टेंसु ने इस फैसले पर अपनी असहमति जताई है. वर्तमान में यह निर्णय सीधे तौर पर वाशिंगटन राज्य और दो निजी कंपनियों बर्लैप एंड बैरल और बेसिक फन पर लागू होता है, लेकिन इसके व्यापक आर्थिक निहितार्थ देखे जा रहे हैं. 


अमेरिकी प्रशासन द्वारा इस फैसले के खिलाफ अपील किए जाने की संभावना है, जबकि भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते को लेकर बातचीत अब नए सिरे से प्रभावित हो सकती है.


यह 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 24 फरवरी, 2026 को लागू किया गया था. इसे लगाने के पीछे की मुख्य वजह एक बड़ी कानूनी हार थी.


दरअसल, इससे पहले ट्रंप सरकार ने 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' (IEEPA) के तहत कई देशों पर भारी शुल्क लगाए थे, जिन्हें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी, 2026 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट का तर्क था कि टैक्स या टैरिफ लगाने की शक्ति अमेरिकी संविधान के तहत संसद (कांग्रेस) के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं.


सुप्रीम कोर्ट के इस झटके के तुरंत बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी व्यापार नीतियों को जारी रखने के लिए 'ट्रेड एक्ट 1974' की धारा 122 (Section 122) का सहारा लिया. इस कानून के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह देश में "गंभीर भुगतान संतुलन संकट" (Balance of Payments crisis) होने पर 150 दिनों के लिए अस्थाई रूप से 15 फीसदी तक का वैश्विक आयात शुल्क लगा सकते हैं. 


सरकार ने तर्क दिया कि अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा एक आर्थिक संकट है और इसी आधार पर 10 फीसदी का नया शुल्क लगाया गया. हालांकि, हालिया फैसले में कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया है. 


अदालत ने स्पष्ट किया कि 'व्यापार घाटा' और 'भुगतान संतुलन संकट' दो अलग चीजें हैं, और वर्तमान आर्थिक स्थिति में राष्ट्रपति के पास इस कानून का उपयोग करके टैरिफ थोपने का कोई कानूनी आधार नहीं था. अदालत के अनुसार, कानून की ऐसी व्याख्या राष्ट्रपति को असीमित शक्तियां दे देगी, जो लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP