अमेरिकी संसद: ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई रोकने प्रस्ताव पास
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को एक बड़ा झटका देते हुए ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को रोकने के निर्देश देने वाले कानून को मंजूरी दे दी है. हाल के दिनों में राष्ट्रपति ट्रम्प की अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी और संसद के बीच बढ़ते गतिरोध के रूप में इसे देखा जा रहा है. सीनेट में इस युद्ध शक्ति प्रस्ताव (वॉर पावर्स रेजोल्यूशन) के पक्ष में 50 और विरोध में 48 वोट पड़े.
गौरतलब है कि यह प्रस्ताव इसी महीने की शुरुआत में संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' से भी पास हो चुका है. अमेरिकी इतिहास में 1973 के 'वॉर पावर्स एक्ट' के लागू होने के बाद यह पहला मौका है जब संसद के दोनों सदनों ने किसी राष्ट्रपति को युद्ध क्षेत्रों से अमेरिकी सेना को हटाने का निर्देश देने वाला प्रस्ताव पारित किया है.
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब ट्रम्प प्रशासन युद्ध के खर्चों को पूरा करने के लिए संसद से अरबों डॉलर की मंजूरी मांगने की तैयारी कर रहा है.
हालांकि, सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास मामूली बहुमत है, लेकिन आगामी नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले पार्टी के ही चार सांसदों ने राष्ट्रपति के रुख के खिलाफ जाकर इस प्रस्ताव का समर्थन किया. इनमें सुसान कोलिन्स, रैंड पॉल, बिल कैसिडी और लिसा मुर्कोव्स्की शामिल हैं, जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के सिर्फ एक सांसद जॉन फेटरमैन ने इसके विरोध में मतदान किया.
हाल ही में जारी रॉयटर्स/इप्सोस के एक जनमत सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 25 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही ईरान के साथ इस युद्ध को सही मानते हैं, जबकि अधिकांश लोगों को डर है कि तेहरान के साथ हुआ संघर्षविराम लंबे समय तक नहीं टिकेगा.
इस बीच, व्हाइट हाउस और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस प्रस्ताव के कानूनी महत्व को लेकर बहस छिड़ गई है. ट्रम्प प्रशासन वर्तमान में ईरान के साथ शांति समझौते के लिए बातचीत कर रहा है.
व्हाइट हाउस के एक अधिकारी का कहना है कि इस वोट का कोई कानूनी महत्व नहीं है क्योंकि इसे राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाएगा और 7 अप्रैल को हुए संघर्षविराम के बाद सैन्य गतिविधियां पहले ही समाप्त हो चुकी हैं.
इसके विपरीत, प्रस्ताव के प्रायोजक और डेमोक्रेटिक सांसदों का तर्क है कि अमेरिकी संविधान युद्ध की घोषणा करने का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं बल्कि संसद को देता है, इसलिए प्रशासन को इस कानून का पालन करना होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि 'वॉर पावर्स एक्ट' की संवैधानिकता का यह मामला अब आने वाले दिनों में कोर्ट के जरिए ही सुलझ पाएगा.