UPI MDR विवाद: जयराम रमेश ने सीतारमण के दावों को बताया 'भ्रामक'
नई दिल्ली । डेस्क: UPI भुगतानों से जुड़े नियमों और मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के उस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि MDR का असर केवल व्यापारियों पर पड़ेगा, आम ग्राहकों पर नहीं.
कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के माध्यम से भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10A में किए जा रहे बदलावों का विरोध करते हुए जयराम रमेश ने वित्त मंत्री के तर्कों को "पांच संदिग्ध दावे" करार दिया. उन्होंने कहा कि जब व्यापारियों पर कोई अतिरिक्त शुल्क या लागत लगाई जाती है, तो वे अंततः उच्च कीमतों या अलग-अलग चार्ज के जरिए इसे आम उपभोक्ताओं पर ही ट्रांसफर कर देते हैं, जैसा कि क्रेडिट और डेबिट कार्ड के मामलों में देखा जाता है.
जयराम रमेश ने तर्क दिया कि जिन्हें सरकार केवल व्यापारी कह रही है, उनमें किराना दुकानें, छोटे कारोबारी और सड़क किनारे रेहड़ी-पटरी वाले शामिल हैं, जो भारत में UPI के विस्तार की असली रीढ़ हैं. उन्होंने कहा कि UPI एक सार्वजनिक डिजिटल संपत्ति है और 'ज़ीरो-एमडीआर' व्यवस्था ही इसकी अपार सफलता की मुख्य वजह रही है.
उन्होंने सरकार के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें कहा गया था कि MDR से बैंकों और फिनटेक कंपनियों को बुनियादी ढांचे, नवाचार और सुरक्षा में निवेश करने में मदद मिलेगी.
कांग्रेस नेता ने सुझाव दिया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास पर्याप्त वित्तीय क्षमता है और वह बिना व्यापारियों या ग्राहकों पर बोझ डाले पूरे डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम का खर्च उठा सकता है. इसके लिए उन्होंने हाल ही में RBI द्वारा केंद्र सरकार को हस्तांतरित किए गए 2.86 लाख करोड़ रुपये के अधिशेष का उदाहरण भी दिया.
संशोधन के समय पर सवाल उठाते हुए जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि यह कदम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें भारत के UPI और रुपे (RuPay) सिस्टम की आलोचना की गई थी.
उन्होंने अंदेशा जताया कि अमेरिकी भुगतान कंपनियों के दबाव में आकर घरेलू सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के वैधानिक संरक्षण को कमजोर किया जा रहा है.
संसद में चर्चा न होने के वित्त मंत्री के आरोपों का जवाब देते हुए रमेश ने कहा कि विपक्ष की वजह से नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही से भागने की नीति के कारण मानसून सत्र बाधित हुआ. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने गतिरोध का फायदा उठाते हुए इस विधेयक को बिना किसी गंभीर बहस के लोकसभा में ध्वनिमत से पारित करा लिया.