अमेरिका-ईरान समझौते पर अनसुलझे सवाल
नई दिल्ली । डेस्क: 100 से अधिक दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद आखिरकार अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध पर पूर्ण विराम लगाने के लिए एक बड़ा समझौता हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक "महान समझौता" करार दिया है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच शत्रुता तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाएगी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुसार, इस ऐतिहासिक समझौते पर आने वाले शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर किए जाएंगे. ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने भी पुष्टि की है कि समझौते के तहत लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियान स्थायी रूप से रोक दिए जाएंगे और ईरान के खिलाफ जारी नौसैनिक नाकेबंदी पूरी तरह समाप्त होगी.
हालांकि, युद्ध रोकने की इस जल्दबाजी के बीच जमीन पर कई ऐसे अनसुलझे सवाल हैं, जो इस समझौते के टिकाऊ होने पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि इस ऐतिहासिक समझौते की बारीकियां क्या हैं और इससे जुड़े प्रमुख सवाल क्या हैं.
क्या इस समझौते पर इजरायल अपनी सहमति देगा?
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना बेहद मुश्किल है कि इजरायल इस समझौते का पूरी तरह पालन करेगा. व्हाइट हाउस ने अभी तक इस समझौते के आधिकारिक 14 सूत्रीय ज्ञापन को सार्वजनिक नहीं किया है, जबकि ईरान द्वारा जारी किए गए विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
ईरान का दावा है कि इस समझौते में लेबनान में इजरायल की तरफ से युद्धविराम शामिल है, लेकिन क्या इजरायल दक्षिणी लेबनान के उस बड़े हिस्से से अपनी सेना हटाएगा जिस पर उसने कब्जा कर रखा है, यह अभी साफ नहीं है. मार्च से लेकर अब तक लेबनान में इजरायली हमलों में 3,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और दस लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं.
इस बीच इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और वे एक स्पष्ट नीति पर चल रहे हैं, जिसके तहत इजरायली सेना लेबनान, सीरिया और गाजा के सुरक्षा क्षेत्रों में अनिश्चित काल के लिए बनी रहेगी.
हाल ही में बेरूत पर हुए इजरायली हमलों को विश्लेषक सौदेबाजी में बढ़त बनाने की इजरायली कोशिश के रूप में देख रहे हैं. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले की तीखी आलोचना करते हुए कहा था कि नेतन्याहू के इस कदम ने समझौते को लगभग पटरी से उतार दिया था और इसके चलते हस्ताक्षर करने में कुछ घंटों की देरी हुई.
इजरायल के भीतर इस समझौते को लेकर क्या प्रतिक्रिया है?
इस समझौते ने इजरायल के घरेलू राजनीतिक परिदृश्य में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ गुस्से को और भड़का दिया है. राजनीतिक स्पेक्ट्रम के दोनों पक्षों के आलोचकों का मानना है कि इजरायल इस युद्ध में अपने मूल रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में पूरी तरह विफल रहा है.
इजरायल में इसे नेतन्याहू की व्यक्तिगत हार के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि ईरान को कमजोर करना उनका जीवन भर का मुख्य प्रोजेक्ट रहा था, लेकिन इस पूरी बातचीत से इजरायल को पूरी तरह बाहर रखा गया.
विपक्ष के नेताओं का कहना है कि नेतन्याहू के इस कार्यकाल के अंत में इजरायल के दुश्मन और मजबूत होकर उभरे हैं. वहीं, देश के कट्टरपंथी धड़े और दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ज्विर ने तो साफ कह दिया है कि इजरायल इस समझौते का हिस्सा नहीं है क्योंकि यह उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता.
शुरुआती रिपोर्टों में हिजबुल्लाह को निशस्त्र करने का कोई जिक्र नहीं है, जो इजरायल का एक बड़ा लक्ष्य था. ऐसे में इजरायल के भीतर इस बात को लेकर भारी असंतोष है कि ईरान सरकार को गिराने या उसके सहयोगियों को कमजोर करने का कोई भी मकसद पूरा नहीं हो सका.
ईरान के परमाणु कार्यक्रम का अब क्या भविष्य होगा?
ईरानी मीडिया के अनुसार, 14 सूत्रीय मसौदे में यह प्रावधान है कि परमाणु मुद्दों पर अंतिम समझौता अगले 60 दिनों के भीतर किया जाएगा. राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अंतिम समझौता ईरान को केवल उसी स्तर तक यूरेनियम संवर्धन की अनुमति देगा जिसका उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिए कभी न किया जा सके. जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या यह व्यवस्था 2015 के ऐतिहासिक परमाणु समझौते जैसी होगी, तो उन्होंने केवल इतना कहा कि ईरान हमेशा के लिए गैर-सैन्य उद्देश्यों के लिए यूरेनियम समृद्ध कर सकेगा.
वर्तमान में परमाणु ऊर्जा के लिए 3 से 5 प्रतिशत संवर्धन की आवश्यकता होती है, जबकि हथियार ग्रेड के लिए यह 90 प्रतिशत होना चाहिए. ईरान के पास इस समय 60 प्रतिशत तक समृद्ध यूरेनियम का एक बड़ा स्टॉक मौजूद है, जिसे हथियार ग्रेड तक पहुंचाना बेहद आसान है.
यह स्टॉक ही बातचीत का सबसे बड़ा पेच बना हुआ है. ट्रंप ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि अगले 60 दिनों में अंतिम परमाणु समझौते पर बात नहीं बनी, तो सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है.
क्या ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगियों पर अंकुश लगाएगा?
इस समझौते का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के नेटवर्क को लेकर फिलहाल कोई सख्त पाबंदी नहीं दिख रही है. युद्ध की शुरुआत में ट्रंप ने दावा किया था कि वे ईरान के मिसाइल उद्योग को पूरी तरह तबाह कर देंगे और हिजबुल्लाह, हमास, हूती जैसे संगठनों को मिलने वाली ईरानी मदद को रोक देंगे.
मगर ताजा खबरों के मुताबिक, वाशिंगटन ने एक बड़ा समझौता करते हुए ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और उसके सहयोगी समूहों के मुद्दे को बातचीत के एजेंडे से ही हटा दिया है. यदि यह जानकारी पूरी तरह सही है, तो इसे अमेरिका का एक बहुत बड़ा पीछे हटना माना जाएगा, क्योंकि हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठन बिना किसी विघटन के वादे के अभी भी पूरी तरह सक्रिय बने हुए हैं.
होर्मुज जलडमरूमध्ये नौवहन की क्या स्थिति रहेगी?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे समझौते के केंद्र में है. दुनिया के कुल तेल और गैस आपूर्ति का पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की है कि उन्होंने इस मार्ग को टोल-मुक्त खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तुरंत हटाने की अनुमति दे दी है. हालांकि, ट्रंप ने यह भी साफ किया है कि शुरुआती दौर में इस समुद्री रास्ते को केवल समुद्री बारूदी सुरंगों (माइन रिमूवल) को हटाने के लिए खोला जाएगा, न कि सामान्य व्यापारिक जहाजों के लिए.
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक शिपिंग उद्योग को इस रास्ते पर दोबारा भरोसा करने में महीनों का समय लग सकता है क्योंकि युद्ध के कारण जहाजों की सुरक्षा को लेकर गहरा डर बैठ गया है. इसके अलावा, ईरान ने आखिरी वक्त में बातचीत के दौरान 'सामुद्रिक सेवा शुल्क' लगाने की बात जोड़ी है, जिसका सीधा मतलब है कि अमेरिका ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों को ईरान को फीस देनी होगी.
क्या ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध तुरंत हटाए जाएंगे?
ईरान को प्रतिबंधों से तुरंत राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. प्रतिबंधों को हटाना बातचीत के अगले चरण का हिस्सा होगा. मसौदे के अनुसार, ईरानी तेल की बिक्री पर लगे प्रतिबंधों को फिलहाल निलंबित किया जा सकता है, लेकिन ईरान के बैंकिंग क्षेत्र को प्रभावित करने वाले व्यापक वित्तीय प्रतिबंधों पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है.
ट्रंप ने अमेरिकी मीडिया से बातचीत में यह भी संकेत दिया है कि यदि ईरानी प्रशासन ने देश के भीतर सरकार विरोधी प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से दबाया, तो प्रतिबंधों से राहत रोकी भी जा सकती है.
दूसरी तरफ, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे यूरोपीय देशों ने कहा है कि वे प्रतिबंध हटाने को तैयार हैं, बशर्ते ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर सकारात्मक प्रगति हो और वह कभी परमाणु हथियार हासिल न करे.
ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों का क्या होगा?
समझौते का एक और बेहद संवेदनशील हिस्सा ईरान की उन संपत्तियों को जारी करना है जो अंतरराष्ट्रीय बैंकों में फ्रीज पड़ी हैं. ईरान का कहना है कि उसे युद्ध के बाद देश के पुनर्निर्माण के लिए इस पैसे की सख्त जरूरत है. खबरों के मुताबिक, समझौते के तहत 60 दिनों की बातचीत की अवधि के दौरान 24 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति को जारी करने का खाका तैयार किया गया है.
ईरान ने शर्त रखी है कि जब तक इस राशि का आधा हिस्सा जारी नहीं होता और होर्मुज जलडमरूमध्य पर पाबंदियां नहीं हटतीं, तब तक वह अंतिम दौर की बातचीत शुरू नहीं करेगा.
हालांकि, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया है कि यह पैसा स्वचालित रूप से जारी नहीं होगा, बल्कि इसे ईरान द्वारा समझौते की शर्तों के पालन से जोड़ा जाएगा. इस बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भी ईरानी फंड को अनलॉक करने की चर्चाएं हैं, जिसे एक ऐसे समाधान के रूप में देखा जा रहा है जिससे ईरान को युद्ध के नुकसान के मुआवजे का दावा करने का मौका मिल जाएगा और वाशिंगटन यह कह सकेगा कि उसने अपनी जेब से कुछ भी भुगतान नहीं किया.
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इस डील का क्या असर पड़ेगा?
डोनाल्ड ट्रंप के इस एलान का वैश्विक बाजारों पर तुरंत और बेहद सकारात्मक असर देखने को मिला है. ट्रंप के "जहाजों के इंजन चालू करो और तेल को बहने दो" के संदेश के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 4 फीसदी की भारी गिरावट आई है और यह युद्ध शुरू होने के बाद के अपने सबसे निचले स्तर यानी 84 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. युद्ध के दौरान कीमतें 100 डॉलर के पार चली गई थीं.
इसके साथ ही अमेरिकी शेयर बाजार के वायदा कारोबार में भी मजबूत बढ़त देखी गई है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेल की कीमतों में गिरावट से दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों को महंगाई से निपटने में बड़ी राहत मिलेगी.
हालांकि, विशेषज्ञों ने यह चेतावनी भी दी है कि खाड़ी देशों जैसे कतर, सऊदी अरब और कुवैत में तेल-गैस के बुनियादी ढांचे को जो नुकसान पहुंचा है, उसके कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह से युद्ध-पूर्व के सामान्य स्तर पर लौटने में अभी कई महीनों का समय लग सकता है.