सुधारों पर यू-टर्न: बांग्लादेश सरकार के फैसले से भड़का राजनीतिक गतिरोध
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश में 2024 के छात्र आंदोलन के बाद जिस 'नए भविष्य' और व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद जगी थी, उस पर वर्तमान में संशय के बादल मंडराने लगे हैं. ढाका से प्राप्त नवीनतम राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार, फरवरी 2026 के चुनावों में सत्ता में आई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के नेतृत्व वाली सरकार ने अंतरिम सरकार द्वारा पेश किए गए कई महत्वपूर्ण सुधारों को पलटने या उन्हें समाप्त करने का निर्णय लिया है.
संसद के इस कदम ने नागरिक समाज, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों के भीतर एक गहरी चिंता पैदा कर दी है कि क्या देश उन लोकतांत्रिक उपलब्धियों से पीछे हट रहा है, जो शेख हसीना के शासन के पतन के बाद हासिल की गई थीं.
प्रधानमंत्री तारिक रहमान की सरकार ने अंतरिम सरकार के समय के 133 अध्यादेशों की समीक्षा की, जिनमें से 23 प्रमुख अध्यादेशों को या तो आधिकारिक तौर पर निरस्त कर दिया गया है या उन्हें संसद में समय सीमा के भीतर पारित न कराकर स्वतः समाप्त होने दिया गया है.
इन रद्द किए गए कानूनों में मानवाधिकार आयोग की शक्तियों में विस्तार, जबरन गायब किए जाने (इनफोर्स्ड डिसएपीयरेंस) के खिलाफ कानूनी सुरक्षा, न्यायिक नियुक्तियों में सुधार और भ्रष्टाचार विरोधी निगरानी जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय शामिल थे.
इस विधायी कदम का सबसे विवादित पहलू राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से जुड़ा है. 2025 के अध्यादेश के तहत आयोग को सुरक्षा बलों और पुलिस के खिलाफ स्वतंत्र जांच करने की शक्ति दी गई थी, लेकिन अब सरकार ने 2009 के पुराने कानून को बहाल कर दिया है. पुराने कानून के तहत आयोग सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ सीधे जांच नहीं कर सकता, बल्कि उसे केवल सरकार से रिपोर्ट मांगने का अधिकार है.
मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि यह सीधे तौर पर 'हितों के टकराव' का मामला है, क्योंकि जिस सरकार पर आरोप होंगे, वही जांच की बागडोर भी संभालेगी. इसके साथ ही, 'जबरन गायब' किए जाने की घटनाओं को एक विशिष्ट अपराध के रूप में परिभाषित करने वाले अध्यादेश का लैप्स होना भी पीड़ितों के परिवारों के लिए एक बड़ा झटका है.
शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल में सैकड़ों लोगों के गायब होने की पुष्टि जांच आयोग ने की है, लेकिन अब कानूनी स्पष्टता के अभाव में ऐसे मामलों में न्याय पाना और भी कठिन हो जाएगा.
संसद के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ गई है. सरकार का तर्क है कि वह सुधारों को पूरी तरह खत्म नहीं कर रही, बल्कि उनमें मौजूद कानूनी खामियों को दूर करने के लिए उनकी समीक्षा कर रही है. गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने स्पष्ट किया है कि इतने कम समय में 133 अध्यादेशों को पारित करना संभव नहीं था और सरकार हितधारकों के साथ परामर्श के बाद अधिक मजबूत कानून लाने की योजना बना रही है.
हालांकि, विपक्षी खेमा इसे 'सत्ता के केंद्रीकरण' की रणनीति बता रहा है. जुलाई विद्रोह का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं और नवगठित नेशनल सिटीजन पार्टी का कहना है कि सरकार उस 'जुलाई नेशनल चार्टर' के साथ विश्वासघात कर रही है, जिसे देश के 70 प्रतिशत लोगों ने जनमत संग्रह में समर्थन दिया था.
बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी जैसे प्रमुख विपक्षी दलों ने भी चेतावनी दी है कि यदि जवाबदेही के इन तंत्रों को बहाल नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे.
विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल कुछ कानूनों को रद्द करने का मामला नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश के राजनीतिक संक्रमण की दिशा को लेकर एक गहरा संघर्ष है. क्या बांग्लादेश एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ेगा जहां संस्थाएं स्वतंत्र हों, या फिर सत्ता एक बार फिर से कार्यपालिका के हाथों में सिमट जाएगी?
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने भी चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा बलों के लिए निवारक कानून कमजोर किए गए, तो अतीत के मानवाधिकार उल्लंघन दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा. वर्तमान में, बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां एक तरफ सरकार की प्रशासनिक मजबूरियां हैं और दूसरी तरफ जनता की वह आकांक्षा, जिसने एक ऐतिहासिक क्रांति को जन्म दिया था.
आने वाले महीनों में होने वाली कानूनी परामर्श प्रक्रिया यह तय करेगी कि क्या तारिक रहमान की सरकार वास्तव में 'सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध' है या फिर यह केवल पुराने तंत्र को नए नाम के साथ जारी रखने की कोशिश है. फिलहाल, ढाका की सड़कों से लेकर संसद की दीर्घाओं तक, लोकतंत्र की मजबूती को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता का माहौल है.