ट्रंप राज में क्या अमेरिका का सोवियत जैसा पतन होगा?
वॉशिंगटन । डेस्क: 1991 में सोवियत संघ के विघटन को 34 साल बीत चुके हैं, लेकिन विश्लेषक अमेरिका में वही लक्षण देख रहे हैं जो मॉस्को के पतन का कारण बने थे. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति के फैसले जैसे सहयोगी देशों को आर्थिक मदद बंद करना, चीन-भारत के साथ शुल्क युद्ध, पश्चिमी यूरोप से दूरी और अफगानिस्तान में फिर सैन्य हस्तक्षेप की धमकी ने दुनिया भर में बहस छेड़ दी है.
कई विशेषज्ञ इन्हें 'अमेरिकी पतन की शुरुआत' बता रहे हैं, ठीक सोवियत के अफगानिस्तान से सेना वापसी और पूर्वी यूरोप में प्रभाव खोने जैसा.
अर्थव्यवस्था पर संकट गहरा रहा है. अमेरिकी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वर्तमान वित्तीय वर्ष में राष्ट्रीय ऋण 37 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया है, जिसका सालाना ब्याज ही 1 लाख करोड़ डॉलर है. आईएमएफ की चेतावनी है कि 2030 तक यह जीडीपी का 140% हो जाएगा.
छात्र ऋण 1.8 लाख करोड़ डॉलर का बोझ है, जिसमें 90 लाख छात्र चुकता करने में असमर्थ हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर को 'सी-ग्रेड' मिला है 43% सड़कें खराब स्थिति में. विज्ञान और गणित में अमेरिका क्रमशः 25वें और 37वें स्थान पर खिसक गया है. बढ़ते आत्महत्या, कट्टरपंथ और अपराध के लिए शराब-मादक और मानसिक हताशा को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है.
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री विलियम नौड ने सोवियत से तुलना कर अमेरिकी पतन के सात कारण गिनाए, जिनमें शीर्ष पर है 'युद्ध अर्थव्यवस्था'.
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सेना रखता है, जिस पर जीडीपी का 15-20% खर्च होता है. अफगानिस्तान युद्ध (20 साल, 8 लाख करोड़ डॉलर), वियतनाम, इराक, सीरिया समेत कई संघर्षों में अरबों डॉलर बह गए, बिना कोई रिटर्न के ही.
2003 के इराक युद्ध का कर्ज 2050 तक रक्षा क्षेत्र में सालाना 6.5 लाख करोड़ डॉलर का बोझ बनेगा. यूक्रेन युद्ध में हथियार सप्लाई जोखिम भरी है अगर कीव गिरा तो अमेरिकी हथियार कंपनियों को नुकसान.
डॉलर का पेट्रो-डॉलर दर्जा खतरे में है.
भारत स्थानीय मुद्रा में व्यापार कर रहा है, रूस ब्रिक्स की साझा मुद्रा चाहता है (जिसमें भारत सदस्य), और सऊदी अरब तेल बिक्री के डॉलर अनुबंध से बाहर हो गया.
ट्रंप का जीवाश्म ईंधन पर जोर और पेरिस जलवायु समझौते से बाहर होना उल्टा पड़ा. दुनिया हरी ऊर्जा की ओर बढ़ रही है.
सोवियत की तरह तकनीकी पिछड़ापन: 1980 के दशक में मॉस्को के पास सिर्फ 10,000 कंप्यूटर थे, जबकि अमेरिका के पास 13 लाख. आज अमेरिकी बाजार आइफोन से इलेक्ट्रिक वाहन तक चीन-भारत पर निर्भर है. ट्रंप के टैरिफ से दिल्ली-बीजिंग से संबंध खराब हो रहे, जो कच्चे माल और कुशल श्रमिकों की कमी पैदा कर सकता है.
उदाहरण स्वरूप, गूगल का बड़ा बाजार भारत (140 करोड़ आबादी) है, लेकिन तनाव से नई दिल्ली अपना सर्च इंजन बना सकती है.
ट्रंप पूर्वी यूरोप और सहयोगियों (जापान, नाटो) पर दबाव डाल रहे हैं, ठीक सोवियत ने किया था.
अफगानिस्तान 'साम्राज्यों का कब्रिस्तान' में फिर सेना भेजना अंतिम कील साबित हो सकता है, जैसे 1979 में सोवियत के लिए.
हालांकि, कुछ विश्लेषक मानते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा सोना भंडार अमेरिका को सोवियत जैसी तबाही से बचाएगा.
कुल मिलाकर, ट्रंप की नीतियां अमेरिका को आइसोलेशन की ओर धकेल रही हैं, जो पतन का संकेत दे रही हैं.