बस्तर में बोधघाट परियोजना पर भड़के आदिवासी
दंतेवाड़ा । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में विकास और विस्थापन को लेकर दशकों पुरानी बहस एक बार फिर पूरी शिद्दत के साथ सड़क पर आ गई है. करीब 47 साल पहले साल 1979 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में जिस बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना की नींव रखी गई थी, उसे लेकर एक बार फिर भारी विरोध शुरू हो गया है.
दंतेवाड़ा जिले के हितालकुडूम गांव में आयोजित एक विशाल महापंचायत में हजारों आदिवासियों ने हुंकार भरते हुए साफ कर दिया है कि वे अपनी जान दे देंगे, लेकिन अपनी जल, जंगल और जमीन पर बांध नहीं बनने देंगे. ग्रामीणों का आरोप है कि इस परियोजना से बस्तर की पहचान और उनकी आने वाली पीढ़ियों का अस्तित्व पूरी तरह खतरे में पड़ जाएगा.
इस पूरे आंदोलन को अब राजनीतिक हवा भी मिलने लगी है. बीजापुर विधानसभा से कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी ने इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने बोधघाट परियोजना को तत्काल वापस नहीं लिया, तो आने वाले समय में एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा किया जाएगा.
विपक्ष का दावा है कि इस परियोजना से तीन-चार जिलों के लगभग 40 से 50 हजार लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे, जिनके विस्थापन और पुनर्वास को लेकर सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं है. विपक्ष का आरोप है कि विकास के नाम पर बस्तर के मूल निवासियों को उजाड़ने की कोशिश की जा रही है.
इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर सरकार का तर्क बिल्कुल अलग है. शासन के अनुसार, बोधघाट बांध से क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जलविद्युत का उत्पादन होगा और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार होगा, जिससे बस्तर संभाग के पिछड़े इलाकों में आर्थिक और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी.
प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और बेहतर पुनर्वास देने का वादा भी किया जा रहा है. हालांकि, स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व के सरकारी अनुभवों को देखते हुए उन्हें इन आश्वासनों पर कतई भरोसा नहीं है और वे किसी भी कीमत पर मुआवजे के बदले अपनी पैतृक भूमि का सौदा नहीं करना चाहते.
आदिवासी समुदाय के लिए यह लड़ाई सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील और सांस्कृतिक है.
बोधघाट संघर्ष समिति के अध्यक्ष शिव कुमार मंडावी के मुताबिक, आदिवासियों की पूरी जीवनशैली प्रकृति से जुड़ी हुई है. इन जंगलों और पहाड़ों में उनके देवी-देवताओं का वास है, जहां पीढ़ियों से पूजा-अर्चना की जा रही है.
यदि यहां जलाशय का निर्माण होता है, तो न केवल उपजाऊ कृषि भूमि और घने जंगल जलमग्न होंगे, बल्कि आदिवासियों की अनमोल सांस्कृतिक विरासत और आस्था के केंद्र भी हमेशा के लिए पानी में डूब जाएंगे.
फिलहाल 18 ग्राम पंचायतों के 56 गांवों के लोग इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन इसका दायरा दंतेवाड़ा, बीजापुर और बस्तर जिले के कई अन्य इलाकों तक फैलने की आशंका है.