अचानकमार: बाघों की संख्या से आगे की कहानी
उपेंद्र कुमार दुबे
जंगल की असली कहानी केवल बाघों की संख्या नहीं है. जब हम किसी जंगल के बारे में सोचते हैं, तो सबसे पहले हमारे मन में एक प्रश्न आता है- वहाँ कितने बाघ हैं? लेकिन बाघ संरक्षण की वास्तविक कहानी केवल संख्या तक सीमित नहीं होती. किसी जंगल में उसकी क्षमता के अनुरूप पर्याप्त संख्या में बाघ होना निश्चित रूप से अच्छी बात है, किंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन बाघों के बीच आनुवंशिक विविधता कितनी है. क्या वे सभी एक ही परिवार से हैं, अथवा अलग-अलग जंगलों से आए बाघ यहाँ मिल रहे हैं, प्रजनन कर रहे हैं और नई पीढ़ी को जन्म दे रहे हैं?
यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर हमें अचानकमार टाइगर रिजर्व में मिलता है. अचानकमार के जंगलों में रहने वाले सभी बाघ स्थानीय नहीं हैं. कुछ बाघ दूर-दराज़ के अन्य टाइगर रिजर्वों से जंगलों और प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोरों के माध्यम से यहाँ पहुँचे हैं. उन्होंने यहाँ अपना क्षेत्र बनाया, साथी चुना और शावकों को जन्म दिया.
इस प्रकार अचानकमार केवल बाघों का घर नहीं रहा, बल्कि विभिन्न जंगलों से आए बाघों के जीन के मिलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है. यही कारण है कि अचानकमार को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि यहाँ कितने बाघ हैं; यह जानना भी उतना ही आवश्यक है कि ये बाघ कहाँ-कहाँ से आए हैं.
प्रकृति की अद्भुत देन
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली जिलों में स्थित अचानकमार टाइगर रिजर्व का इतिहास अत्यंत समृद्ध है. वर्ष 1975 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था. उस समय इसका क्षेत्रफल 551.552 वर्ग किलोमीटर था. बाद में 9 फरवरी 2009 को इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला और इसका क्षेत्र बढ़ाकर 914.017 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया. इसमें 626.195 वर्ग किलोमीटर कोर क्षेत्र तथा 287.822 वर्ग किलोमीटर बफर क्षेत्र शामिल हैं.
सतपुड़ा और मैकल पर्वतमालाओं की गोद में बसा अचानकमार प्रकृति की अनुपम सुंदरता से भरपूर है. यहाँ ऊँचे-ऊँचे पर्वत, गहरी घाटियाँ, विस्तृत पठार, चट्टानी कगार, प्राकृतिक गुफाएँ तथा कहीं-कहीं खुले घास के मैदान भी हैं. घने साल के जंगलों के बीच सागौन और बाँस के वन इस पूरे क्षेत्र को और अधिक समृद्ध बनाते हैं.
यहाँ बाघ के साथ-साथ तेंदुआ, हाथी, भालू, ढोल, भेड़िया, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, गौर, सांभर, चीतल, चौसिंघा, कोटरी, मूषक हिरण तथा जंगली सूअर जैसे अनेक वन्यजीव पाए जाते हैं. भरपूर शिकार, पर्याप्त जल स्रोत और सुरक्षित वन क्षेत्र- ये सभी मिलकर अचानकमार को बाघों के लिए एक आदर्श आवास बनाते हैं.
बाघों की संख्या से आगे की कहानी
यदि किसी जंगल में बाघों की आबादी लंबे समय तक अलग-थलग रहे और केवल आपस में ही प्रजनन करती रहे, तो इनब्रीडिंग का खतरा बढ़ सकता है. इसके परिणामस्वरूप आने वाली पीढ़ियों में रोगों के प्रति संवेदनशीलता, शारीरिक कमजोरी तथा प्रजनन क्षमता में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं.
इसके विपरीत, जब कोई बाघ दूसरे जंगल से आकर स्थानीय बाघों के साथ प्रजनन करता है, तो वह अपने साथ नए जीन भी लाता है. यही जीन विविधता आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वस्थ, सक्षम और मजबूत बनाती है. इसलिए यह कहा जा सकता है कि वन्यजीव कॉरिडोर केवल जंगलों को ही नहीं जोड़ते, बल्कि बाघों के जीन को भी जोड़ते हैं.
अचानकमार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आने वाले अनेक बाघों की कहानी दूसरे टाइगर रिजर्वों से जुड़ी हुई है, जो प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोरों के महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाती है.
कॉरिडोर और जीन विविधता की कहानी
अचानकमार टाइगर रिजर्व में पाए जाने वाले बाघों की कहानियाँ इसके सक्रिय वन्यजीव कॉरिडोरों और आनुवंशिक विविधता का जीवंत प्रमाण हैं. AKT-8 (झुमरी) बांधवगढ़ से प्राकृतिक रूप से अचानकमार पहुँची. यहाँ उसने सफलतापूर्वक प्रजनन किया और उसकी संतति इस कॉरिडोर की महत्ता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है.
AKT-14 पेंच से होते हुए अचानकमार पहुँची और यहाँ दूसरी बार प्रजनन कर रही है. यह पेंच-कान्हा-अचानकमार परिदृश्य के प्राकृतिक जुड़ाव का सशक्त प्रमाण है.
AKT-22 का कान्हा से अचानकमार पहुँचना स्थानीय बाघ आबादी में नए जीन के प्रवाह का महत्वपूर्ण उदाहरण है.
वहीं ATR-16, जिसे सूरजपुर में मानव-बाघ संघर्ष के दौरान घायल अवस्था में रेस्क्यू कर उपचार के बाद अचानकमार में छोड़ा गया था, आज सफलतापूर्वक प्रजनन कर रही है. यह संरक्षण प्रयासों की सफलता की एक प्रेरक कहानी है.
रजनी नामक एक उम्रदराज़ बाघिन को वर्ष 2021 में गंभीर रूप से घायल अवस्था में रेस्क्यू किया गया था. लगभग एक वर्ष तक उसकी देखभाल की गई, किंतु उसे बचाया नहीं जा सका. कैमरा ट्रैप और वैज्ञानिक पहचान से यह ज्ञात हुआ कि उसका जन्म वर्ष 2009 में बांधवगढ़ में हुआ था. उसकी जीवन-यात्रा भी बांधवगढ़ और अचानकमार के बीच वर्षों से सक्रिय प्राकृतिक संपर्क का महत्वपूर्ण प्रमाण है.
बाघ केवल आते नहीं, आगे भी जाते हैं
अचानकमार में केवल दूसरे जंगलों से बाघ आते ही नहीं हैं, बल्कि यहाँ के कई युवा बाघ बड़े होने के बाद अपना नया क्षेत्र खोजने के लिए आगे भी निकलते हैं. यही प्रकृति का नियम है. जब कोई युवा नर या मादा बाघ अपनी जन्मभूमि छोड़ता है, तो वह नए क्षेत्र की तलाश में जंगलों के बीच लंबी यात्रा करता है.
इसी यात्रा के दौरान वह दूसरे जंगलों तक पहुँचता है और अपने साथ नए जीन भी ले जाता है.
कैमरा ट्रैप निगरानी तथा वैज्ञानिक बाघ पहचान से यह स्पष्ट हुआ है कि अचानकमार मध्य भारत के विभिन्न जंगलों के बीच एक महत्वपूर्ण जैविक सेतु की भूमिका निभा रहा है.
अचानकमार से जुड़े प्रमुख वन्यजीव कॉरिडोर
कान्हा-अचानकमार कॉरिडोर
यह कॉरिडोर मैकल पर्वतमाला के घने जंगलों से होकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों को जोड़ता है. बाघ, हाथी, तेंदुए तथा अन्य वन्यजीवों के आवागमन के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक मार्ग है.
अचानकमार-बांधवगढ़ कॉरिडोर
मैकल और विंध्य पर्वतमालाओं के बीच स्थित यह प्राकृतिक सेतु मरवाही क्षेत्र से होते हुए बांधवगढ़ तक जाता है. झुमरी और रजनी जैसी बाघिनों की यात्राएँ इसकी महत्ता का जीवंत प्रमाण हैं.
उत्तर-पूर्वी कॉरिडोर
यह कॉरिडोर अचानकमार को छत्तीसगढ़ के उत्तरी वन क्षेत्रों से जोड़ते हुए गुरु घासीदास-तैमोर पिंगला तथा आगे झारखंड के पलामू क्षेत्र तक पहुँचता है. इन परस्पर जुड़े जंगलों में बाघों, हाथियों और अन्य वन्यजीवों की निरंतर आवाजाही होती रहती है.
कॉरिडोर बचेंगे, तभी बाघ बचेंगे
कल्पना कीजिए कि जंगलों के बीच बने प्राकृतिक मार्ग अचानक बंद हो जाएँ और सड़कें, रेल लाइनें, खनन, बस्तियाँ अथवा अन्य विकास कार्य जंगलों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दें. ऐसी स्थिति में बाघों के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक पहुँचना कठिन हो जाएगा. धीरे-धीरे अलग-अलग बाघ आबादियाँ एक-दूसरे से कट जाएँगी, जिससे उनके बीच जीन का आदान-प्रदान कम हो जाएगा और भविष्य में आनुवंशिक विविधता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है.
इसके विपरीत, यदि जंगल परस्पर जुड़े रहें और प्राकृतिक कॉरिडोर सुरक्षित बने रहें, तो युवा बाघ सुरक्षित रूप से नए क्षेत्र खोज सकेंगे, दूसरी बाघ आबादियों तक पहुँच सकेंगे और नई पीढ़ियों में नए जीन का प्रवाह बनाए रख सकेंगे. इसलिए कॉरिडोर केवल जंगलों के बीच बने रास्ते नहीं हैं, बल्कि बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं.
बाघ संरक्षण का अर्थ केवल टाइगर रिजर्व की सीमाओं की रक्षा करना नहीं है, बल्कि उन जंगलों और वन क्षेत्रों को भी सुरक्षित रखना है, जो एक टाइगर रिजर्व को दूसरे टाइगर रिजर्व से जोड़ते हैं. कई बार बाघ का भविष्य टाइगर रिजर्व के भीतर नहीं, बल्कि दो टाइगर रिजर्वों के बीच स्थित जंगलों में तय होता है.
अचानकमार टाइगर रिजर्व से जुड़े वन्यजीव कॉरिडोरों की महत्ता केवल बाघों के आवागमन तक सीमित नहीं है, बल्कि वे मध्य भारत में बाघों के दीर्घकालिक अस्तित्व और उनकी आनुवंशिक विविधता के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. जब कान्हा, बांधवगढ़, पेंच, गुरु घासीदास-तैमोर पिंगला तथा अन्य वन क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक संपर्क बना रहता है, तब बाघ एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकते हैं, नए क्षेत्रों में अपना निवास स्थापित कर सकते हैं और विभिन्न आबादियों के बीच जीन का आदान-प्रदान संभव हो पाता है. यही जीन प्रवाह बाघों की आनुवंशिक विविधता को बनाए रखने तथा आने वाली पीढ़ियों को अधिक स्वस्थ, सक्षम और मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
इस प्रकार, कॉरिडोर केवल जंगलों को जोड़ने वाले प्राकृतिक मार्ग नहीं हैं, बल्कि मध्य भारत के बाघों के भविष्य की जीवनरेखाएँ हैं. यदि ये कॉरिडोर सुरक्षित रहेंगे, तो बाघों की आवाजाही, जीन प्रवाह और प्राकृतिक आबादियों का परस्पर जुड़ाव भी बना रहेगा. यही बाघ संरक्षण की वास्तविक सफलता होगी.
* लेखक WWF के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी हैं.