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जब पेरिस से आई चिट्ठी- TEEJAN BAI, INDIA

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05 जुल. 2026, 06:47 AM 11 मिनट में पढ़ें 1

TEEJAN BAI, Pandwani
TEEJAN BAI, Pandwani

रायपुर | संवाददाता: फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक चिट्ठी भारत भेजी गई. उस पर न गांव का नाम था, न डाकघर, न जिला और न ही पूरा पता. लिफाफे पर केवल इतना लिखा था- Teejan Bai, India.


आश्चर्य की बात यह है कि वह चिट्ठी अपने सही ठिकाने तक पहुंच गई. यह घटना किसी संयोग की नहीं, बल्कि उस पहचान की थी, जिसे एक अनपढ़ लोक कलाकार ने अपनी प्रतिभा से अर्जित किया था. छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव अटारी से निकलकर पूरी दुनिया तक पहुंचने वाली तीजन बाई उस समय केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि भारत की लोकसंस्कृति की प्रतिनिधि बन चुकी थीं. आज जब तीजन बाई नहीं हैं तो ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ ने अपनी एक आवाज़ खो दी.


दुनिया उन्हें पंडवानी गायिका कहती थी, लेकिन उनकी कला को केवल गायन कहना अन्याय होगा. वे मंच पर आते ही कथावाचक, अभिनेता, संगीतकार और पात्र, सब कुछ बन जाती थीं. उनके हाथ का तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का धनुष और कभी युद्धभूमि का संकेत. उनके चेहरे पर बदलते भावों के साथ महाभारत के पात्र दर्शकों की आंखों के सामने जीवित हो उठते थे. भाषा समझ में आए या न आए, लेकिन भाव हर दर्शक तक पहुंच जाते थे. यही कारण था कि यूरोप के सभागारों में बैठे लोग भी उसी तल्लीनता से उन्हें सुनते थे, जिस तरह छत्तीसगढ़ के गांवों की चौपाल में बैठे श्रोता सुनते थे.


आज पंडवानी का नाम लेते ही सबसे पहले तीजन बाई का चेहरा सामने आता है, लेकिन जब उन्होंने यह यात्रा शुरू की थी, तब परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं. उस समय पंडवानी को मुख्यतः ग्रामीण इलाकों की लोककथा माना जाता था. महिलाओं के लिए भी इसकी सीमाएं तय थीं. उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे बैठकर, सीमित हावभाव के साथ प्रस्तुति दें. मंच पर अभिनय करना और पूरी देह के साथ कथा को जीना लगभग पुरुष कलाकारों का अधिकार माना जाता था.


तीजन बाई ने इसी परंपरा को सबसे पहले चुनौती दी. उन्होंने बैठकर गाने की परंपरा छोड़ दी और खड़े होकर प्रस्तुति देना शुरू किया. महाभारत के पात्रों को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अभिनय और देहभाषा से जीवंत किया. उनके इस अंदाज ने पंडवानी की कपालिक शैली को नई पहचान दी. बाद में यही शैली उनकी पहचान बन गई.


विडंबना यह है कि जिस कलाकार ने पूरी दुनिया को पंडवानी की नई शैली से परिचित कराया, उसे स्वयं वर्षों तक यह नहीं मालूम था कि वह जिस विधा में गा रही हैं, उसका नाम कपालिक शैली है. भोपाल के भारत भवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पहली बार उन्हें बताया गया कि उनकी प्रस्तुति पारंपरिक वेदमती शैली से अलग है. तब तक वे हजारों लोगों को अपना मुरीद बना चुकी थीं.


उनकी सफलता के पीछे कोई संस्थागत प्रशिक्षण नहीं था. न संगीत विद्यालय, न रंगमंच का औपचारिक अभ्यास और न ही साहित्य की पढ़ाई. उनकी सबसे बड़ी पाठशाला गांव का जीवन था. महाभारत के प्रसंग उन्होंने किताबों से नहीं, बल्कि सुन-सुनकर सीखे. मां के चाचा बृजलाल पारधी जब पंडवानी गाते, तो छोटी तीजन दूर बैठकर पूरी कथा याद करती रहतीं. शब्दों के साथ भाव भी स्मृति में उतरते चले गए.


घर की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि कला के बारे में सोचा जा सके. परिवार खेतों में मजदूरी करता था. खाली समय में खजूर और छिंद के पत्तों से झाड़ू और चटाइयां बनाकर बाजार में बेचता था. छोटी उम्र से ही तीजन भी यही काम करती थीं. खेतों में काम करते हुए करमा, ददरिया और सुआ गीत गाना उनका शौक था. गांव की छोटी-छोटी गायन प्रतियोगिताओं में वे अक्सर बाजी मार लेती थीं, लेकिन तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यही लड़की आगे चलकर भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कलाकारों में गिनी जाएगी.


उनका निजी जीवन लगातार संघर्षों से भरा रहा. किशोरावस्था में ही विवाह हो गया. वैवाहिक जीवन में स्थिरता नहीं मिली. बाद में दूसरा विवाह भी हुआ, लेकिन वहां भी कला को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुए. परिवार चाहता था कि वे घर-गृहस्थी तक सीमित रहें, जबकि तीजन बाई के लिए पंडवानी सांस लेने जैसी आवश्यकता बन चुकी थी.


एक दिन मंच पर प्रस्तुति के दौरान उनके पति ने सबके सामने उन्हें अपमानित किया. यह घटना किसी भी कलाकार को तोड़ सकती थी, लेकिन तीजन बाई के लिए वही मोड़ उनके जीवन का सबसे बड़ा निर्णय बन गया. उन्होंने घर छोड़ दिया. साथ में थोड़ा-सा राशन था और छोटे-छोटे बच्चे. आगे क्या होगा, इसका कोई भरोसा नहीं था. लेकिन उन्हें इतना विश्वास जरूर था कि यदि उनकी आवाज़ सच है, तो वह उन्हें रास्ता जरूर दिखाएगी.


यही विश्वास उन्हें चंदखुरी गांव ले गया. वहां उन्होंने लोगों के सामने पंडवानी सुनाई. गांव वालों ने पहली बार किसी महिला को इस तरह पूरी ऊर्जा और अभिनय के साथ महाभारत प्रस्तुत करते देखा. कार्यक्रम समाप्त होते-होते उनकी चर्चा पूरे इलाके में फैल गई. गांव के मालगुजार ने उन्हें सम्मानित किया, भोजन की व्यवस्था कराई और चौपाल में लगातार कार्यक्रम रखवाए. तीन दिन तक कथा चली, फिर दूसरे गांव में सात दिन और उसके बाद अठारह दिनों तक लगातार महाभारत का गायन हुआ.


उनकी प्रसिद्धि धीरे-धीरे प्रदेश की सीमाओं से बाहर पहुंची. छत्तीसगढ़ के रंगकर्मी हबीब तनवीर ने जब उनकी प्रस्तुति देखी, तो उन्हें भोपाल बुलाया. बाद में नया थिएटर के साथ काम करने का प्रस्ताव भी मिला. कुछ समय तक उन्होंने नाट्य अभ्यास किया, लेकिन जल्द ही महसूस किया कि उनका वास्तविक मंच रंगमंच नहीं, बल्कि पंडवानी ही है. उन्होंने अभिनय संस्था की बजाय लोककला को चुना. यह निर्णय आगे चलकर भारतीय लोककला के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में शामिल हुआ.


इसके बाद उनके कार्यक्रम देशभर में होने लगे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निवास पर प्रस्तुति से लेकर दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक 'भारत एक खोज' तक उनकी पहुंच बनी. फिर विदेशों से निमंत्रण आने लगे. पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई. पहली बार हवाई जहाज में बैठते समय वे घबराई हुई थीं. बादलों के बीच उड़ते विमान को देखकर उन्हें लगा था कि शायद वे देवलोक की यात्रा पर निकल पड़ी हैं. विदेश पहुंचकर उन्हें यह भी डर था कि जो लोग उनकी भाषा नहीं जानते, वे उनकी कथा कैसे समझेंगे. लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद तालियों की गूंज ने उन्हें बता दिया कि लोककला की असली भाषा शब्द नहीं, संवेदना होती है.


यहीं से तीजन बाई की पहचान छत्तीसगढ़ की सीमा से निकलकर पूरी दुनिया में फैल गई. पंडवानी अब केवल लोककला नहीं रही; वह भारतीय सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी थी. और इस परिवर्तन के केंद्र में थीं, अटारी गांव की वह महिला, जिसने कभी स्कूल की किताबें नहीं पढ़ीं, लेकिन महाभारत को अपनी आवाज़ में इस तरह जीवित किया कि दुनिया उसे सुनने लगी.


देश-विदेश में पहचान मिलने के बाद भी तीजन बाई के भीतर गांव की वही सहज महिला जीवित रही, जिसने गरीबी को बहुत करीब से देखा था. एक समय ऐसा भी आया, जब दुनिया भर में कार्यक्रम करने वाली इस कलाकार ने स्थायी आय के लिए भिलाई इस्पात संयंत्र में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी स्वीकार कर ली. उनका काम लोगों को पानी पिलाना था. कई लोगों को यह बात अजीब लगती थी कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित कलाकार एक सरकारी उपक्रम में साधारण कर्मचारी के रूप में काम कर रही है. लेकिन तीजन बाई इसे लेकर कभी असहज नहीं हुईं.


उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि प्रसिद्धि ने उन्हें बदला नहीं. वे मंच पर जितनी प्रभावशाली दिखाई देती थीं, मंच से उतरते ही उतनी ही सहज हो जाती थीं. बातचीत में कोई बनावट नहीं, पहनावे में कोई दिखावा नहीं और व्यवहार में कोई कृत्रिमता नहीं. वे अक्सर कहती थीं कि कलाकार की असली ताकत उसके भीतर होती है, कपड़ों या मंच की रोशनी में नहीं.


धीरे-धीरे तीजन बाई भारतीय लोककला की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पहचान बन गईं. उन्हें देश के लगभग हर बड़े सांस्कृतिक आयोजन में बुलाया जाने लगा. दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक 'भारत एक खोज' में उनकी प्रस्तुति ने उन्हें उन लोगों तक भी पहुंचाया, जो पहले पंडवानी से परिचित नहीं थे. विदेश यात्राओं का सिलसिला भी लगातार बढ़ता गया. फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, इटली और ब्रिटेन सहित अनेक देशों में उन्होंने भारतीय लोककला का प्रतिनिधित्व किया. भाषा अलग थी, संस्कृति अलग थी, लेकिन उनकी प्रस्तुति हर जगह दर्शकों से संवाद स्थापित कर लेती थी. वे मानती थीं कि कला की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह अनुवाद की मोहताज नहीं होती.


उनकी लोकप्रियता के साथ सम्मान भी बढ़ते गए. भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री, फिर पद्मभूषण और अंततः पद्मविभूषण से सम्मानित किया. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ने उनकी कला को संस्थागत मान्यता दी, जबकि गुरुघासीदास विश्वविद्यालय और इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधियां प्रदान कर यह स्वीकार किया कि औपचारिक शिक्षा से वंचित यह महिला स्वयं एक जीवित विश्वविद्यालय है. उन्होंने यह साबित कर दिया कि ज्ञान केवल किताबों से नहीं, अनुभव और साधना से भी अर्जित किया जा सकता है.


समय के साथ उनकी कहानी नई पीढ़ी तक भी पहुंचने लगी. कुछ वर्ष पहले उनके जीवन पर फिल्म बनाने की घोषणा हुई थी. उन्हें उम्मीद थी कि उनकी यात्रा बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी. हालांकि, उनकी जीवनी पर अनेक शोध हुए और देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में लोककला पर होने वाले अध्ययन में उनका नाम प्रमुखता से शामिल किया जाने लगा.


बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी सामने आने लगीं. वर्ष 2018 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा. डॉक्टरों ने आराम करने की सलाह दी, लेकिन कुछ ही समय बाद वे फिर मंच पर लौट आईं. उनके लिए प्रस्तुति केवल पेशा नहीं थी, बल्कि जीवन जीने का तरीका थी. जब तक शरीर साथ देता रहा, वे पंडवानी गाती रहीं.


लेकिन जीवन ने उनके सामने कुछ ऐसी व्यक्तिगत त्रासदियां भी रखीं, जिनसे उबरना आसान नहीं था. उनके दो बेटों का असमय निधन हुआ. विशेष रूप से बड़े बेटे की मृत्यु ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. परिवार के लोगों के अनुसार, इस घटना के बाद उनकी जीवंतता पहले जैसी नहीं रही. वे पहले की तुलना में अधिक शांत रहने लगीं.


इसी बीच उन्हें पक्षाघात का आघात भी लगा. धीरे-धीरे उनकी सक्रियता सीमित होती चली गई. जो कलाकार कभी मंच पर घंटों खड़े होकर महाभारत का युद्ध रच देती थी, वही अब बिस्तर तक सीमित होने लगी. उनकी स्मरण शक्ति भी कमजोर पड़ने लगी थी. घर के लोग बताते थे कि बीमारी के अंतिम दिनों में वे कई बार बच्चों जैसी बातें करती थीं. मानो जीवन एक पूरा चक्र पूरा करके फिर उसी मासूमियत की ओर लौट आया हो, जहां से उसने शुरुआत की थी.


बीमारी के दौरान कुछ समय तक उनकी सरकारी पेंशन भी बंद रही. बाद में जब यह मामला सार्वजनिक हुआ, तब प्रशासन हरकत में आया और पेंशन दोबारा शुरू की गई. चिकित्सकों की टीम उनके इलाज के लिए भेजी गई. छत्तीसगढ़ राज्योत्सव के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फोन पर उनका हालचाल जाना, जिसके बाद उन्हें रायपुर स्थित एम्स में भर्ती कराया गया. इलाज के बाद वे गांव तो लौट आईं, लेकिन उनका स्वास्थ्य पहले जैसा नहीं हो सका. अंततः लंबी बीमारी के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली.


तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार की विदाई नहीं है. उन्होंने भारतीय लोककलाओं की उस सोच को बदल दिया, जिसमें लोक परंपराओं को सीमित दायरे की कला माना जाता था. उन्होंने दिखाया कि यदि प्रस्तुति में ईमानदारी और कला में दम हो, तो गांव की बोली भी अंतरराष्ट्रीय सभागारों में उतनी ही प्रभावशाली हो सकती है जितनी किसी बड़े शहर की भाषा.


उन्होंने यह भी साबित किया कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उनमें नए प्रयोग करने का साहस हो. यदि वे भी अपने समय की सामाजिक बंदिशों को स्वीकार कर बैठ जातीं, तो शायद पंडवानी आज भी सीमित दायरे में सिमटी रहती. उन्होंने खड़े होकर प्रस्तुति दी, अभिनय को कथा का हिस्सा बनाया और महाभारत को केवल धार्मिक आख्यान नहीं रहने दिया, बल्कि उसे मानवीय संवेदनाओं की जीवंत कहानी में बदल दिया.


आज छत्तीसगढ़ के गांवों में जब कोई नई कलाकार तंबूरा उठाती है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं तीजन बाई की छाया मौजूद होती है. पंडवानी की चर्चा उनके बिना अधूरी है. उन्होंने केवल अपनी पहचान नहीं बनाई, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता तैयार किया.


समय बीतता रहेगा. नए कलाकार आएंगे, नई आवाजें सुनाई देंगी, लेकिन भारतीय लोककला के इतिहास में तीजन बाई का स्थान स्थायी रहेगा. उन्होंने मिट्टी की खुशबू, लोकभाषा की मिठास और महाभारत की विराट कथा को जिस तरह अपनी आवाज़ में पिरोया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा. शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है, उसका शरीर एक दिन साथ छोड़ देता है, लेकिन उसकी कला समय की स्मृति में हमेशा जीवित रहती है.



कुछ तारीखें

1956 – दुर्ग जिले के अटारी गांव में जन्म.

12 वर्ष की उम्र – पहला विवाह.

13 वर्ष की उम्र – चंदखुरी में पहली सार्वजनिक पंडवानी.

7 जुलाई 1986 – भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी.

1988 – पेरिस के भारत महोत्सव में प्रस्तुति और पद्मश्री.

1988 – दूरदर्शन के भारत एक खोज में प्रस्तुति.

1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार.

2003 – पद्मभूषण और गुरुघासीदास विश्वविद्यालय से डी.लिट.

2007 – नृत्य शिरोमणि सम्मान.

2017 – इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से डी.लिट.

2018 – दिल का दौरा, फिर मंच पर वापसी.

2019 – पद्मविभूषण.

2023 – बेटे शत्रुघ्न का निधन, फिर पक्षाघात.

5 जुलाई 2026- निधन

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP