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ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से NATO टूट सकता है

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10 जन. 2026, 12:59 AM 5 मिनट में पढ़ें 1

डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन

नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की मंशा ने ट्रांस-अटलांटिक दुनिया में गहरी बेचैनी पैदा कर दी है. विशेषज्ञों और यूरोपीय नेताओं का मानना है कि यदि अमेरिका ने डेनमार्क के स्वशासित क्षेत्र ग्रीनलैंड पर दबाव या सैन्य कार्रवाई के जरिए कब्जा करने की कोशिश की, तो यह न केवल यूरोप-अमेरिका संबंधों को तोड़ देगा, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी नाटो (North Atlantic Treaty Organisation) की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को भी प्रभावी रूप से खत्म कर सकता है.


ट्रंप ने हाल ही में खुले तौर पर कहा कि “हमें ग्रीनलैंड चाहिए, बिल्कुल चाहिए. यह हमारी रक्षा के लिए जरूरी है.” व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा प्रशासन की शुरुआत से ही यह अमेरिका की “औपचारिक नीति” रही है कि ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाया जाए. इन बयानों ने डेनमार्क और पूरे यूरोप को चौंका दिया है, क्योंकि ग्रीनलैंड कानूनी रूप से डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का पूर्ण सदस्य देश है.

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डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका किसी दूसरे नाटो देश पर हमला करता है, तो नाटो की नींव ही ढह जाएगी. उनके शब्दों में, “अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड को बलपूर्वक अपने कब्जे में लिया, तो नाटो की सामूहिक रक्षा की अवधारणा खासकर अनुच्छेद 5 का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा.” अनुच्छेद 5 के तहत नाटो के किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है.


रणनीतिक विशेषज्ञों का भी यही मानना है. शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन मियर्शाइमर के अनुसार, यूक्रेन युद्ध और ग्रीनलैंड संकट मिलकर नाटो के लिए “घातक दोहरा झटका” साबित हो सकते हैं. उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में नाटो केवल नाम का गठबंधन रह जाएगा, एक “छाया” मात्र.


यूरोप की चिंता केवल नाटो तक सीमित नहीं है. कई विश्लेषकों का मानना है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दबदबा रूस के हितों को भी सीधा फायदा पहुंचाएगा. रूस पहले ही यूक्रेन में यह तर्क दे चुका है कि बड़े देश अपने “प्रभाव क्षेत्र” में मनमानी कर सकते हैं. यदि अमेरिका ग्रीनलैंड को जबरन अपने अधीन करता है, तो यह रूस के लिए एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी और यूक्रेन युद्ध में मॉस्को की स्थिति मजबूत हो सकती है.


यूरोपीय थिंक टैंकों का कहना है कि अमेरिका की ऐसी कार्रवाई विश्व व्यवस्था को “जंगल के कानून” की ओर धकेल देगी, जहां ताकतवर देश कमजोर इलाकों को अपनी संपत्ति समझने लगेंगे. जर्मनी के राष्ट्रपति फ्रैंक-वाल्टर स्टाइनमायर ने भी चेताया है कि साझा मूल्यों के टूटने से वैश्विक व्यवस्था कमजोर होगी और अराजकता बढ़ेगी.


फ्रांस और जर्मनी जैसे देश पहले से ही सतर्क दिख रहे हैं. जब ट्रंप ने पहली बार ग्रीनलैंड को लेकर अपनी इच्छा जाहिर की थी, तब फ्रांस ने उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाकर संकेत दिया था कि यूरोप अपने क्षेत्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा. फ्रांस के विदेश मंत्री और जर्मनी के शीर्ष नेताओं ने भी कहा है कि ग्रीनलैंड की रक्षा, सिद्धांततः, नाटो की जिम्मेदारी है.


हालांकि यह भी स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए किस रास्ते पर चलेंगे. कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि सीधा सैन्य हमला अमेरिका के लिए भी बेहद जोखिम भरा होगा. लेकिन दबाव, आर्थिक प्रलोभन, राजनीतिक हस्तक्षेप और स्वायत्तता आंदोलन को हवा देना जैसे “हाइब्रिड तरीके” अपनाए जा सकते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, ग्रीनलैंड के निवासियों को प्रति व्यक्ति भारी आर्थिक पैकेज देने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है.


ग्रीनलैंड की अहमियत केवल भौगोलिक नहीं है. आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिनका रणनीतिक और आर्थिक मूल्य तेजी से बढ़ रहा है. इसके अलावा, ग्रीनलैंड दुर्लभ खनिज संसाधनों का भी बड़ा भंडार माना जाता है, जो भविष्य की तकनीकों के लिए बेहद जरूरी हैं. अमेरिका, रूस और चीन तीनों ही आर्कटिक को भविष्य की शक्ति-स्पर्धा का केंद्र मानते हैं.


लेकिन सवाल यह है कि क्या ग्रीनलैंड की कीमत नाटो के टूटने के बराबर है? यूरोप के कई रणनीतिकार मानते हैं कि यदि अमेरिका इस दिशा में आगे बढ़ता है, तो नाटो जैसा ऐतिहासिक गठबंधन अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट का सामना करेगा. ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोशिश केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं होगी, बल्कि यह उस वैश्विक सुरक्षा ढांचे को तोड़ सकती है, जिसने दशकों तक पश्चिमी दुनिया को एकजुट रखा है.


गौरतलब है कि नाटो (NATO - North Atlantic Treaty Organization) एक अंतरसरकारी सैन्य गठबंधन है जिसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 को बारह संस्थापक सदस्यों द्वारा उत्तरी अटलांटिक संधि (वाशिंगटन संधि) पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी. इसका मुख्यालय बेल्जियम के ब्रुसेल्स में है.


मुख्य उद्देश्य:

सामूहिक रक्षा: संधि के मुख्य सिद्धांत के रूप में कार्य करता है, जिसमें कहा गया है कि किसी एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा और वे मिलकर उसका जवाब देंगे (अनुच्छेद 5).


सुरक्षा और स्थिरता: राजनीतिक और सैन्य माध्यमों से अपने सदस्यों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की गारंटी देना.


लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना: अटलांटिक क्षेत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देना और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में काम करना. 


वर्तमान में, नाटो में 32 सदस्य देश हैं, जिनमें उत्तरी अमेरिका और यूरोप के कई देश शामिल हैं. यह एक सुरक्षा गठबंधन है जो अपने सदस्य देशों के बीच परामर्श और रक्षा सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करता है. 

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP