परमाणु क्षेत्र में निजी भागीदारी को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट करेगा समीक्षा
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने 'सतत परमाणु ऊर्जा दोहन और उन्नति' (SHANTI) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की है. यह कानून देश के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी संस्थाओं की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करता है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने होली की छुट्टियों के बाद इस मामले पर विस्तृत सुनवाई करने का निर्णय लिया है. अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से इस संबंध में वैश्विक विनियामक तंत्र का विवरण प्रस्तुत करने को कहा है.
सुनवाई के दौरान पीठ ने विषय की संवेदनशीलता को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को भी रेखांकित किया.
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि ऊर्जा स्रोतों को लेकर अक्सर विरोध होता रहा है, परंतु राष्ट्र के विकास के लिए ऊर्जा क्षमता बढ़ाना अनिवार्य है.
जब प्रशांत भूषण ने सौर ऊर्जा को सस्ता विकल्प बताया, तो न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि सौर ऊर्जा के लिए आवश्यक लिथियम जैसे खनिजों हेतु भारत को अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है.
याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिसंबर 2025 में संसद द्वारा जल्दबाजी में पारित यह अधिनियम सुरक्षा मानकों के साथ समझौता करता है और 1987 के ओलियम गैस रिसाव मामले में निर्धारित 'पूर्ण दायित्व के सिद्धांत' का उल्लंघन करता है.
ई.ए.एस. सरमा और पांच वैज्ञानिकों द्वारा दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि निजी ऑपरेटरों की जवाबदेही कम करने से भविष्य में चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी आपदाओं का जोखिम बढ़ सकता है.