सुप्रीम कोर्ट: पीयरलेस का 35 साल पुराना शेयरधारक विवाद खत्म
कोलकाता । डेस्क: 35 वर्षों से चले आ रहे भारत के सबसे लंबे कॉर्पोरेट कानूनी विवादों में से एक पर आखिरकार विराम लग गया है. देश की सर्वोच्च अदालत ने पीयरलेस के प्रमोटर रॉय परिवार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए अल्पसंख्यक शेयरधारक की याचिका को खारिज कर दिया है. इस फैसले के बाद कंपनी प्रबंधन ने राहत की सांस ली है और इसे संस्थान के हितों की जीत बताया है.
NCLAT के फैसले में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने नेशनल कंपनी लॉ एपेलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के पिछले आदेश को बरकरार रखा. शीर्ष अदालत ने पारसमल लोढा के नेतृत्व वाली भगवती डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (BDPL) द्वारा दायर अपील में हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया. अदालत के इस रुख के बाद रॉय परिवार को मिली कानूनी जीत पर अंतिम मुहर लग गई है.
1980 के दशक से चला आ रहा था विवाद
इस ऐतिहासिक विवाद की शुरुआत साल 1991 में हुई कानूनी कार्यवाहियों से हुई थी, जो वास्तव में 1987-88 के दौरान पीयरलेस द्वारा लिए गए कॉर्पोरेट फैसलों और शेयरों के लेन-देन से जुड़ी थी. कंपनी ने अपने पूंजी आधार को मजबूत करने के लिए 30,000 इक्विटी शेयरों के प्राइवेट प्लेसमेंट का निर्णय लिया था, जिसे बोर्ड और शेयरधारकों की मंजूरी प्राप्त थी. इसी दौरान लोढा द्वारा रॉय परिवार से जुड़ी संस्थाओं को 15,626 शेयर ट्रांसफर किए गए थे. हालांकि, बाद में लोढा ने आरोप लगाया कि इन सौदों का मकसद कंपनी का नियंत्रण हासिल करना और फंड का दुरुपयोग करना था, जिसके बाद यह मामला तीन दशकों से अधिक समय तक अदालत में उलझा रहा.
NCLT से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
वर्ष 2022 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की कोलकाता पीठ ने इन शेयरों के जारी होने और बिक्री को अमान्य घोषित कर दिया था. उस समय लोढा ने पीयरलेस (PGFI) में अपनी 47 प्रतिशत हिस्सेदारी का दावा किया था. लेकिन 16 अप्रैल 2026 को NCLAT ने NCLT के फैसले को रद्द करते हुए पीयरलेस की अपीलों को स्वीकार कर लिया. अब सुप्रीम कोर्ट ने भी NCLAT के उसी आदेश पर अपनी सहमति जताते हुए विपक्षी पक्ष की अपील खारिज कर दी.
भविष्य की ओर देखने का मौका: रॉय परिवार
इस फैसले पर खुशी व्यक्त करते हुए PGFI के प्रबंध निदेशक जयंत रॉय ने कहा कि तीन दशकों से भी अधिक समय के बाद यह फैसला पीयरलेस के इतिहास के एक लंबे अध्याय का अंत करता है. उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल कानूनी लड़ाई का अंत नहीं है, बल्कि पीयरलेस को अब नए दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने का अवसर देता है.
कानूनी लड़ाई जारी रखने का लोढा का इरादा
दूसरी ओर, लगभग 23 प्रतिशत हिस्सेदारी का दावा करने वाले पारसमल लोढा इस फैसले से असहमत हैं. उन्होंने इस कानूनी लड़ाई को आगे भी जारी रखने का संकल्प जताया है. लोढा का कहना है कि यह मुकदमेबाजी का अंत नहीं है और उनके पास अभी भी कई कानूनी विकल्प मौजूद हैं. वे इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) दाखिल करने की तैयारी में हैं.