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SC: हादसे में मौत पर गृहिणियों की मानद आय ₹30,000 महीना

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11 जून 2026, 11:10 PM 3 मिनट में पढ़ें 2

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: देश की सर्वोच्च अदालत ने गृहिणियों (होममेकर्स) के योगदान को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ लफ्जों में कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं असल में 'राष्ट्र निर्माता' हैं. अदालत ने आदेश दिया है कि अगर किसी सड़क हादसे में किसी गृहिणी की मौत होती है, तो मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) उनके परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे की गणना के लिए उनकी काल्पनिक मासिक आय कम से कम 30,000 रुपये प्रति माह मानकर चलेगा.


जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया. कोर्ट ने लैंगिक रूढ़िवादिता और पुरानी सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि अक्सर गृहिणियों को कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर मान लिया जाता है, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है.

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सच तो यह है कि घर के कमाने वाले सदस्य खुद गृहिणी पर पूरी तरह निर्भर होते हैं क्योंकि उनके बिना घर का सुचारू रूप से चलना नामुमकिन है. कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा कि जब एक महिला खाना बनाती है, सफाई करती है और परिवार को संभालने के लिए दिन-रात काम करती है, तो उसे 'बिना आय' वाला कैसे समझा जा सकता है?


यह मामला साल 2001 में एक सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाली महिला से जुड़ा है, जिसके परिवार को न्याय के लिए पूरे 25 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा. सुप्रीम कोर्ट ने इस अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की और परिवार को मिलने वाले मुआवजे की राशि को 8.4 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 63 लाख रुपये कर दिया.


इसके साथ ही साल 2001 से अब तक इस राशि पर 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज देने का भी हुक्म दिया गया है. कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि तीन महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया, तो ब्याज दर बढ़कर 9 प्रतिशत और छह महीने बाद 12 प्रतिशत सालाना हो जाएगी.


शीर्ष अदालत ने गृहिणियों के अदृश्य काम को मान्यता देने के लिए 'लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर' (घरेलू देखभाल का नुकसान) नाम से एक नया न्यायिक फॉर्मूला भी तैयार किया है. इसके तहत मुआवजे की गणना तीन मुख्य आधारों पर होगी-पहला, घर के रोजमर्रा के कामों को संभालने की क्षमता का नुकसान; दूसरा, बच्चों द्वारा अपनी मां को खोने का दर्द; और तीसरा, पति द्वारा जीवनसाथी को खोना, जो घर की रीढ़ थी.


अपने फैसले में देश की अर्थव्यवस्था में महिलाओं के योगदान के आंकड़े पेश करते हुए बेंच ने कहा कि भारत की जीडीपी में महिलाओं के अवैतनिक (बिना वेतन वाले) घरेलू काम का योगदान करीब 15 से 17 प्रतिशत होने का अनुमान है. दुनिया भर में हर दिन लगभग 16 अरब घंटे बिना किसी भुगतान के सिर्फ घरेलू कामकाज और देखभाल में लगाए जाते हैं.


कोर्ट ने कहा कि महिलाएं उस मानव पूंजी (ह्यूमन कैपिटल) को तैयार करने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं, जिसके दम पर भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहा है. इसलिए अब समय आ गया है कि गृहिणियों के इस अमूल्य और अब तक अदृश्य रहे योगदान को पूरे सम्मान के साथ समाज और कानून के सामने लाया जाए.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP