सोशल मीडिया ट्रायल: क्या सोशल मीडिया वाकई एक नशा है?
लॉस एंजिल्स । डेस्क: कैलिफोर्निया की सुपीरियर कोर्ट में टेक जगत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी मुकाबला शुरू हो गया है. मेटा, टिकटॉक और यूट्यूब पहली बार एक जूरी के सामने इस आरोप का सामना कर रहे हैं कि उनके प्लेटफॉर्म युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुँचा रहे हैं. यह मुकदमा न केवल इन कंपनियों की जवाबदेही तय करेगा, बल्कि आने वाले समय में हजारों अन्य मुकदमों के लिए एक मिसाल भी पेश करेगा.
इस कानूनी प्रक्रिया में स्नैपचैट की मूल कंपनी 'स्नैप इंक' भी शामिल थी, लेकिन उसने ट्रायल शुरू होने से ठीक पहले एक अज्ञात राशि देकर मामले को सुलझा लिया है.
यह ट्रायल करीब छह से आठ हफ्तों तक चलने की उम्मीद है, जिसमें जूरी चयन की प्रक्रिया ही कई दिनों तक चलेगी. इस मुकदमे का सबसे बड़ा आकर्षण मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग समेत अन्य शीर्ष अधिकारियों की गवाही होगी.
वादी पक्ष, 19 वर्षीय युवती केजीएम ने आरोप लगाया है कि इन कंपनियों ने जानबूझकर 'स्लॉट मशीन' और सिगरेट उद्योग जैसी मनोवैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग किया ताकि बच्चों को उनके ऐप की लत लग जाए.
याचिका के अनुसार, इन प्लेटफॉर्म्स के 'डिजाइन फीचर्स' केवल लाभ कमाने और विज्ञापन राजस्व बढ़ाने के लिए युवाओं को जोड़े रखने हेतु तैयार किए गए थे, जिसके परिणामस्वरूप केजीएम को गहरे अवसाद और आत्मघाती विचारों से जूझना पड़ा.
विशेषज्ञ इस मामले की तुलना 1998 के उस ऐतिहासिक तंबाकू ट्रायल से कर रहे हैं, जिसने पूरी इंडस्ट्री को हिला दिया था. यदि जूरी वादी के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो यह टेक कंपनियों के उस सुरक्षा कवच (सेक्शन 230) को भेद देगा जो उन्हें थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए जिम्मेदारी से बचाता है.
दूसरी ओर, टेक कंपनियों के वकीलों का तर्क है कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए लगातार 'सेफगार्ड्स' जोड़ रहे हैं और माता-पिता के लिए वर्कशॉप व स्क्रीन टाइम लिमिट जैसे फीचर्स दे रहे हैं.
दुनिया भर में इस मामले का असर दिखने लगा है. जहां ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन कर दिया है, वहीं फ्रांस भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों पर प्रतिबंध लगाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है.