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SIR एक Frankenstein Monster बन चुकी है- खड़गे

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21 सित. 2026, 09:10 AM 3 मिनट में पढ़ें 3

खड़गे
खड़गे

नई दिल्ली । डेस्क: दिल्ली में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक घमासान तेज़ हो गया है. मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), दिल्ली द्वारा "VIP/चिह्नित मतदाताओं" को जारी नोटिसों पर स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है.


खड़गे ने SIR को 'फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर' क्यों कहा?


मल्लिकार्जुन खड़गे का आरोप है कि SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) कोई सुधारवादी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी 'त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया' (Flawed Process) बन चुकी है जो अब नियंत्रण से बाहर हो गई है और खुद इसे लागू करने वालों के लिए ही मुसीबत पैदा कर रही है.

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गौरतलब है कि लोककथाओं में 'फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर' (Frankenstein Monster) एक ऐसे प्राणी को कहा जाता है जिसे बनाया तो किसी और मकसद से गया था, लेकिन बाद में वह अपने ही निर्माताओं के लिए विनाशकारी और बेकाबू हो जाता है. खड़गे ने SIR की तुलना इससे करते हुए मुख्य रूप से निम्नलिखित तर्क और उदाहरण पेश किए:


सत्तापक्ष और वीआईपी हस्तियों का खुद इसकी ज़द में आना:


खड़गे के अनुसार, जिस SIR प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी, अब वह खुद 'पावर्स-दैट-बी' (सत्ता में बैठे लोगों) के दरवाज़े तक आ पहुँची है. दिल्ली के ड्राफ्ट SIR रोल्स में देश की कई अति-महत्वपूर्ण हस्तियों (VIPs) के नाम 'विसंगतियों' (logical discrepancies) के कारण नोटिस की सूची में आ गए हैं.


उदाहरण: पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व थल सेनाध्यक्ष उपेंद्र द्विवेदी, चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू और सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद जैसे दिग्गजों को रिकॉर्ड में विसंगतियों के चलते नोटिस जारी किए गए हैं. खड़गे का कहना है कि जो प्रक्रिया आम लोगों को परेशान करने के लिए लाई गई थी, अब उसने अपने ही लोगों को घेरना शुरू कर दिया है.


'VIP' बनाम 'आम नागरिक' का भेदभाव और संवैधानिक उल्लंघन:


जब वीआईपी लोगों को नोटिस मिले, तो दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने तुरंत एक प्रेस नोट जारी कर सफाई दी कि नोटिस मिलने का मतलब नाम काटना नहीं है. इस पर खड़गे ने सवाल उठाया कि क्या अब भारत के 'सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार' में वीआईपी और आम नागरिकों की अलग श्रेणी बना दी गई है? उन्होंने इसे 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन बताया और कहा- "वीआईपी के लिए प्रेस रिलीज़, और करोड़ों आम मतदाताओं के लिए चुप्पी!"


बड़े पैमाने पर गलत तरीके से नाम काटना:


उदाहरण: बंगाल में SIR के तहत हुए डिलीशन के खिलाफ जो अपीलें तय हुईं, उनमें से 93% मामलों में आम जनता की जीत हुई और 1,13,943 लोगों को दोबारा मतदाता सूची में बहाल करना पड़ा. खड़गे ने पूछा कि जब 93% मामलों में गलत तरीके से नाम काटे गए थे, तो किस आधार पर नागरिकों से उनका मूल मताधिकार छीना गया था?


आम जनता का उत्पीड़न:


इस पूरी प्रक्रिया के चलते आम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है. आईआईटी में पीएचडी आवेदनों के रुकने से लेकर बंगाली भाषी मजदूरों को दूसरे राज्यों में संदिग्ध मानकर हिरासत में लिए जाने तक जैसी गंभीर समस्याएं सामने आई हैं.


इन सभी उदाहरणों को सामने रखते हुए खड़गे ने निष्कर्ष निकाला कि SIR अब एक बेकाबू 'फ्रैंकेंस्टीन मॉन्स्टर' का रूप ले चुका है, जो लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है और मतदाताओं के अधिकारों पर चोट कर रहा है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP