रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए 'कब्रिस्तान' बना समुद्र
नई दिल्ली । डेस्क: संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी करते हुए बताया है कि साल 2025 दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में समुद्री रास्तों से पलायन करने वालों के लिए अब तक का सबसे घातक साल रहा है. यूएन के अनुसार, पिछले वर्ष बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में लगभग 900 रोहिंग्या शरणार्थी या तो मारे गए या लापता हो गए.
शुक्रवार को जिनेवा में पत्रकारों से बात करते हुए UNHCR के प्रवक्ता बाबर बलोच ने इस क्षेत्र को हजारों बेबस रोहिंग्याओं के लिए एक 'अचिह्नित कब्रिस्तान' करार दिया.
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में समुद्र में डूबने वालों की संख्या 5,000 के पार पहुंच गई है.
साल 2017 में म्यांमार में जातीय हिंसा से बचने के लिए लाखों रोहिंग्या बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में बस गए थे.
हालांकि, इन शिविरों में मानवीय सहायता की कमी, शिक्षा के अभाव और रोजगार के सीमित अवसरों के कारण लोग बेहतर भविष्य की तलाश में जानलेवा समुद्री यात्राएं करने को मजबूर हैं. 2026 में भी अब तक 2,800 से अधिक लोग इन खतरनाक रास्तों पर निकल चुके हैं.
हाल ही में 8 अप्रैल को बांग्लादेश के टेकनाफ बंदरगाह से मलेशिया जा रही एक भीड़भाड़ वाली नौका अंडमान सागर में डूब गई थी, जिसमें करीब 250 लोग सवार थे. इस हादसे में केवल नौ लोगों को बचाया जा सका, जबकि सैकड़ों अब भी लापता हैं.
UNHCR ने चेतावनी दी है कि म्यांमार में जारी संघर्ष, उत्पीड़न और नागरिकता की उम्मीद न होने के कारण शरणार्थी इन घातक रास्तों को चुनने पर मजबूर हैं, जिनमें से आधे से अधिक महिलाएं और बच्चे हैं. एजेंसी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे इस मानवीय संकट पर ध्यान दें ताकि 2026 में मौतों का यह रिकॉर्ड दोबारा न टूटे.
रोहिंग्या कौन हैं-
रोहिंग्या मुख्य रूप से म्यांमार (बर्मा) के राखाइन राज्य में रहने वाला एक मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय है, जिन्हें दुनिया के सबसे पीड़ित और प्रताड़ित समुदायों में से एक माना जाता है.
म्यांमार सरकार इन्हें अपने देश का नागरिक मानने से इनकार करती है और इन्हें 'अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी' मानती है, जिसके कारण ये दशकों से नागरिकता विहीन हैं.
2017 में म्यांमार सेना की दमनकारी कार्रवाई और बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बाद लाखों रोहिंग्याओं को अपना घर छोड़कर पड़ोसी देशों, विशेषकर बांग्लादेश, में शरण लेनी पड़ी.
वर्तमान में ये लोग भारी संख्या में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं और बेहतर जीवन की तलाश में अक्सर जान जोखिम में डालकर समुद्री रास्तों से दूसरे देशों की ओर पलायन करने की कोशिश करते हैं.