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एल नीनो पर वैज्ञानिकों में मतभेद, दो धड़े में बंटे

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24 जून 2026, 06:48 PM 6 मिनट में पढ़ें 1

एल नीनो
एल नीनो

नई दिल्ली । डेस्क: इस वर्ष प्रशांत महासागर में एल नीनो की दोबारा दस्तक ने वैश्विक स्तर पर मौसम वैज्ञानिकों को गहरी चिंता में डाल दिया है. लेकिन इस प्राकृतिक घटना के दोबारा सक्रिय होने के साथ ही वैज्ञानिक समुदाय स्पष्ट रूप से दो अलग-अलग धड़ों में बंट गया है. मुख्य विवाद इस बात को लेकर है कि क्या लगातार शक्तिशाली हो रहे एल नीनो का सीधा संबंध वैश्विक जलवायु परिवर्तन से है या फिर यह समुद्र और वायुमंडल की एक सामान्य और प्राकृतिक हलचल का हिस्सा है. 


एक तरफ वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इसके लिए मानवीय गतिविधियों और बढ़ते प्रदूषण को जिम्मेदार ठहरा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक और संस्थाएं इस थ्योरी को खारिज कर रही हैं. इन दोनों विचारधाराओं के बीच छिड़ी इस तीखी बहस ने दुनिया भर के नीति-निर्माताओं और मौसम विभागों के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया है.


जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार मानने वाले वैज्ञानिकों के धड़े का नेतृत्व नेशनल ओशिनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मायकेल मैकफाडेन और चीन के ओशन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता वनजू काई जैसे विशेषज्ञ कर रहे हैं. इस समूह का दावा है कि औद्योगीकरण के बाद से जिस तरह ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, उसी के परिणामस्वरूप एल नीनो की तीव्रता और आवृत्ति में ढाई प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है. 


वैज्ञानिकों के इस पक्ष का कहना है कि यदि पृथ्वी का तापमान इस गति से नहीं बढ़ रहा होता, तो एल नीनो इतना विनाशकारी रूप अख्तियार नहीं करता. 


संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इसी चिंता को दोहराते हुए कहा है कि यह भयंकर रूप से गर्म हो रही धरती की आग में घी डालने जैसा है, जो आने वाले समय में तापमान को सामान्य से ३ डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाकर सूखे और भुखमरी जैसी बड़ी प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे सकता है.


 मौसम विज्ञानियों के एक वर्ग के अनुसार, इस साल का एल नीनो वर्ष १९५० के बाद का सबसे भीषण और रिकॉर्ड तोड़ने वाला एल नीनो साबित हो सकता है, जो पूरे २०२७ तक सक्रिय रहकर वैश्विक मौसम चक्र को पूरी तरह तहस-नहस कर देगा.


इसके विपरीत, वैज्ञानिकों का दूसरा धड़ा इस पूरे घटनाक्रम को बिल्कुल अलग नजरिए से देखता है. नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च की शोधकर्ता क्लारा डेसार और खुद वर्ल्ड मेटीरियोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) इस मतभेद के दूसरे छोर पर खड़े हैं. 


इस दूसरे धड़े के विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि एल नीनो समुद्र की एक बेहद जटिल और स्वतः होने वाली प्रक्रिया है, जिसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए अभी तक कोई ठोस, पुख्ता या अकादमिक प्रमाण नहीं मिले हैं. उनके अनुसार, मौसम का अपना एक अनियंत्रित और अराजक स्वभाव होता है और यह बदलाव उसी प्राकृतिक विश्रृंखलता का हिस्सा है. 


इस गुट के वैज्ञानिकों का तर्क है कि १९५० से पहले या १८०० के दशक से पहले का कोई भी प्रामाणिक लिखित डेटा उपलब्ध न होने के कारण यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि अतीत में ऐसी घटनाएं नहीं होती थीं. 


हालांकि, इस भारी मतभेद और वैचारिक टकराव के बावजूद, दोनों ही धड़े इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं कि कारण चाहे जो भी हो, इस साल का एल नीनो दुनिया भर में कृषि, जल संकट और भीषण गर्मी के रूप में एक भयानक मानवीय और आर्थिक आपदा लाने वाला है.


अल नीनो क्या है ?


प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना को एल नीनो कहा जाता है. आम तौर पर, प्रशांत महासागर में बहने वाली व्यापारिक हवाएं (ट्रेड विंड्स) गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं, जिससे दक्षिण अमेरिका के तटीय इलाकों में नीचे से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है. लेकिन एल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे गर्म पानी वापस पूर्व की ओर यानी दक्षिण अमेरिका (विशेषकर पेरू और इक्वाडोर) के तटों की तरफ बहने लगता है. 


इसके कारण मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का एक बहुत बड़ा हिस्सा अत्यधिक गर्म हो जाता है, जिससे पूरी दुनिया के वायुमंडल और मौसम चक्र में भारी उथल-पुथल मच जाती है. स्पैनिश भाषा में 'एल नीनो' का अर्थ 'छोटा लड़का' या 'बाल ईसा' होता है, क्योंकि दक्षिण अमेरिका के मछुआरों ने इस बदलाव को सबसे पहले दिसंबर यानी क्रिसमस के आसपास महसूस किया था.


भारत के लिए एल नीनो का आगमन अमूमन एक बुरी खबर लेकर आता है, क्योंकि इसका सीधा और नकारात्मक असर देश के दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर पड़ता है. जब प्रशांत महासागर का पानी गर्म होता है, तो भारत में मानसून की हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे देश में बारिश सामान्य से काफी कम होती है. 


इसके परिणामस्वरूप भारत के कई राज्यों को भीषण सूखे, पानी की भारी किल्लत और अत्यधिक गर्मी या हीटवेव का सामना करना पड़ता है. 


मानसून कमजोर होने के कारण खरीफ फसलों, जैसे कि धान, गन्ना और दलहन के उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होती है और देश में खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है. 


हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर एल नीनो वर्ष में भयंकर सूखा ही पड़े, लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत के अधिकांश बड़े सूखे एल नीनो के दौर में ही आए हैं.


ला नीनो क्या है ?


इसके ठीक विपरीत, ला नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है जिसे एल नीनो की 'जुड़वां बहन' या उसका बिल्कुल उलटा रूप माना जाता है. स्पैनिश में 'ला नीनो' का अर्थ 'छोटी लड़की' होता है. ला नीनो के दौरान प्रशांत महासागर में बहने वाली व्यापारिक हवाएं सामान्य से बहुत ज्यादा शक्तिशाली हो जाती हैं, जिसके कारण वे समुद्र के गर्म पानी को बहुत तेजी से एशिया और इंडोनेशिया की तरफ धकेलती हैं. 


इसके असर से पूर्वी प्रशांत महासागर में ठंडे पानी की मात्रा बहुत बढ़ जाती है और समुद्र का तापमान सामान्य से काफी नीचे गिर जाता है. भारत के नजरिए से ला नीनो बेहद फायदेमंद माना जाता है, क्योंकि इसके प्रभाव से भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून अत्यंत मजबूत हो जाता है और देश में सामान्य या सामान्य से अधिक भारी बारिश होती है. 


ला नीनो के कारण भारत में कृषि उत्पादन बढ़ता है, जलाशय पानी से भर जाते हैं और कड़ाके की ठंड पड़ती है, हालांकि अत्यधिक बारिश के चलते देश के कुछ हिस्सों में भीषण बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP