SC ने ठेकेदार के 84 लाख रुपये रोकने का आदेश किया रद्द
नई दिल्ली । डेस्क: सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी द्वारा ठेकेदार के नए चालू कार्यों के बिलों से 84,17,003 रुपये की कटौती करने के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है. अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह यह रोकी गई राशि 27 सितंबर 2025 से भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ ठेकेदार को तुरंत जारी करे. यह फैसला न्यायमूर्ति पमिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने सुनाया, जिसकी मुख्य पीठिका न्यायमूर्ति अराधे द्वारा लिखी गई है.
हाईकोर्ट का निर्णय हुआ निरस्त
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस जनवरी 2026 के आदेश को भी दरकिनार कर दिया, जिसमें ठेकेदार की याचिकाओं को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि इस मामले में तथ्यों का विवाद शामिल है. शीर्ष अदालत ने माना कि उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण गलत था, क्योंकि वास्तविक सवाल यह था कि क्या सरकार किसी अन्य असंबंधित अनुबंध से जुड़े विवादित दावे के आधार पर चालू कार्यों के स्वीकृत बिलों से राशि की कटौती कर सकती है या नहीं.
पुराने सड़क निर्माण का विवाद
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, फर्म को जनवरी 2023 में लगभग 437.43 लाख रुपये के दो सड़क निर्माण अनुबंध मिले थे. बाद में उसे सितंबर 2023 और नवंबर 2024 के बीच प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत तीन और नए काम दिए गए. ठेकेदार ने नए कार्यों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पूरा करके चालू बिल जमा किए, लेकिन उनका भुगतान रोक दिया गया.
दूसरी ओर, शुरुआती सड़क निर्माण कार्यों को लेकर जिला कलेक्टर द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति ने जनवरी 2024 में रिपोर्ट दी थी कि केवल 1.55 करोड़ रुपये का कार्य हुआ है, जबकि 3.55 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है. इसके आधार पर एजेंसी ने पुराने मामले में 2.01 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान का दावा करते हुए नए अनुबंधों के बिलों से 84.17 लाख रुपये की राशि काट ली.
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की सरकार की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि अनुबंध की शर्तें और प्री-कॉन्ट्रैक्ट इंटीग्रिटी पैक्ट सरकार को अन्य कार्यों से इस प्रकार की वसूली करने का अधिकार देते हैं. हालांकि, शीर्ष अदालत ने अनुबंध के सभी संबंधित प्रावधानों का गहन विश्लेषण किया और पाया कि इनमें से कोई भी शर्त वर्तमान परिस्थिति में कटौती का समर्थन नहीं करती.
अदालत ने स्पष्ट किया कि कुछ शर्तें केवल देरी पर लगने वाले नुकसान से संबंधित हैं, तो कुछ अनुबंध रद्द होने की स्थिति में लागू होती हैं. वहीं, इंटीग्रिटी पैक्ट या अन्य शर्तों के तहत कटौती करने से पहले संबंधित ठेकेदार को नोटिस देना और उसका पक्ष सुनना अनिवार्य था, जिसका पालन इस मामले में नहीं किया गया.
असत्यापित दावा कभी कर्ज नहीं हो सकता
अदालत ने केंद्रीय कानून के पुराने नजीर का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि जब तक किसी कथित अतिरिक्त भुगतान या नुकसान की भरपाई कानून के अनुसार तय नहीं हो जाती, तब तक वह केवल एक विवादित दावा रहता है, कोई वर्तमान कर्ज नहीं. सरकार केवल अपने पास मौजूद किसी अन्य भुगतान की राशि को रोककर अपने असत्यापित दावे की भरपाई खुद-ब-खुद नहीं कर सकती. यह कदम न केवल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन था, बल्कि प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का भी खुला हनन था.
आपराधिक मामलों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि इस फैसले का पुराने कार्यों से जुड़े आपराधिक मामलों या विभागीय जांच के गुणों-दोषों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. अदालत ने कहा कि सरकार नियमानुसार पुराने विवादित भुगतानों की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है. अदालत की यह टिप्पणी केवल वसूली के गलत तरीके तक सीमित है और इससे लंबित कानूनी कार्यवाहियों पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा.