सलवा जुडूम विस्थापितों की घर वापसी कब होगी?
रायपुर । संवाददाता: सलवा जुडूम अभियान अब अतीत की बात हो चुकी है, और सरकार ने अगले वर्ष तक नक्सलवाद को समाप्त करने का वादा किया है. लेकिन इस अभियान के दौरान छत्तीसगढ़ से विस्थापित हुए हजारों लोगों की घर वापसी का सवाल अभी भी अनुत्तरित है.
ये विस्थापन मुख्य रूप से दक्षिण बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा क्षेत्रों से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और महाराष्ट्र की ओर हुए थे. आज भी, कई विस्थापित लोग अस्थायी बस्तियों में रह रहे हैं, जबकि कुछ ने पड़ोसी राज्यों को अपना स्थायी घर बना लिया है.
प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सलवा जुडूम अभियान के दौरान भागे हुए लोगों को उनके गांवों में वापस लाने की कोई पहल हो रही है. वलासा अधिकारुलु समक्या के सचिव वेट्टी भीमैया ने बताया कि उनका परिवार 2001 में सुकमा, छत्तीसगढ़ से तेलंगाना चला गया था.
उन्होंने कहा, “416 गांवों के लोग तेलंगाना में आए. इनमें से अधिकांश बीजापुर से थे. 2016 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, इस दौरान लगभग चार लाख लोग पलायन कर गए.”
उन्होंने दावा किया कि हालांकि इन प्रवासियों को तेलंगाना में शिक्षा मिली, लेकिन वे मूलभूत सुविधाओं और अपने अधिकारों से वंचित हैं. वन विभाग के अधिकारियों द्वारा उन्हें उनके रहने की जगहों से बेदखल किया जाता है, और उन्हें आदिवासी सूची में शामिल नहीं किया गया है, जिसके कारण वे सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं.
भीमैया का कहना है कि बार-बार अनुरोध के बावजूद, छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें वापस लाने की कोई पहल नहीं की है. उन्होंने कहा, “कौन अपने घर वापस नहीं आना चाहेगा? हम सभी वापस आना चाहते हैं. लेकिन आज भी, आंतरिक क्षेत्रों में आतंक का माहौल है.” उन्होंने बताया कि सरकार भले ही नक्सलवाद को समाप्त करने का दावा करे, लेकिन लोग अभी भी डरे हुए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दावा किया कि कोविड महामारी के दौरान भी सलवा जुडूम अभियान के दौरान विस्थापित लोगों की वापसी के लिए प्रयास किए गए थे. उन्होंने कहा, “विस्थापित लोगों से यहां वापस आने को कहा गया था और उनके रहने की व्यवस्था का आश्वासन दिया गया था. लेकिन फिर हमारी सरकार चली गई. वर्तमान सरकार आदिवासियों की देखभाल नहीं कर रही है, बल्कि उन्हें विस्थापित कर रही है. आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित किया जा रहा है. जंगलों को काटा जा रहा है.”
इस बीच, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव ने नक्सल प्रभावित गांवों में लागू हो रही ‘नियद नेल्लानार’ (मेरा अपना अच्छा गांव) योजना की ओर इशारा किया.
उन्होंने कहा, “बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सुविधाओं, पेयजल, शिक्षा, स्कूल और मोबाइल नेटवर्क के लिए काम शुरू हो चुका है. लोगों का सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा है. लोग धीरे-धीरे अपने गांवों में लौट रहे हैं.”
पूर्व पुलिस महानिदेशक राजीव माथुर का मानना है कि जो लोग चले गए थे, वे धीरे-धीरे वापस आएंगे. उन्होंने कहा कि लोगों को राजनीतिक आश्वासन की जरूरत है कि उनकी सरकार उनकी रक्षा करेगी.
उन्होंने कहा, “जो लोग अन्य राज्यों में गए थे, वे धीरे-धीरे महसूस कर रहे हैं कि उनकी सरकार काम कर रही है और नक्सलियों को अब हटाया जा रहा है. सभी लोग धीरे-धीरे वापस आएंगे. नक्सलियों की स्थिति ऐसी है कि उनकी जो आग थी, वह बुझ चुकी है और अब केवल धुआं बाकी है.”
निरीक्षकों का कहना है कि सलवा जुडूम अभियान के दौरान लगभग एक लाख लोग पलायन कर गए थे, और पिछली सरकार ने उनकी वापसी के लिए एक समिति बनाई थी और कदम उठाए थे.
बस्तर के पत्रकार मनीष गुप्ता ने बताया, “इतना समय बीत चुका है कि अब वे वापस नहीं आना चाहते. जो वापस आना चाहते हैं, उन्हें डर है कि नक्सली उन्हें मार देंगे या स्थानीय लोग उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे.”
सामाजिक कार्यकर्ता शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि सलवा जुडूम के दौरान पलायन करने वालों की स्थिति अनिश्चित बनी हुई है. न तो उनकी सही गिनती की गई है और न ही उनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस योजना बनाई गई है.
उन्होंने एक बैठक में मौजूद होने का दावा करते हुए कहा, “उस समय, आंध्र प्रदेश ने 8,000 और तेलंगाना ने 24,000 विस्थापित लोगों की जानकारी दी थी, जबकि छत्तीसगढ़ सरकार ने 13,000 का आंकड़ा पेश किया था. विभिन्न राज्यों और एजेंसियों के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि कुल संख्या 50,000 से अधिक हो सकती है, लेकिन केंद्र या राज्य सरकारों ने अभी तक पारदर्शी सर्वेक्षण नहीं किया है.”
चौधरी ने जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में घोषित राहत पैकेज की ओर इशारा करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ के विस्थापित लोगों को अभी तक आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (आईडीपी) का दर्जा नहीं दिया गया है.
उन्होंने कहा, “जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के प्रभावित लोगों के लिए आवास, शिक्षा और रोजगार की योजनाएं बनाई गईं, लेकिन छत्तीसगढ़ के विस्थापित आदिवासियों के जीवन को बेहतर करने के लिए न तो ठोस प्रयास किए गए और न ही कोई दीर्घकालिक नीति बनाई गई.”
चौधरी ने जोर देकर कहा कि विस्थापित लोगों के पास न तो सुरक्षित आवास है, न ही रोजगार की गारंटी है, और न ही उनके बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए स्थायी व्यवस्था है. वे आज भी सामान्य जीवन से दूर हैं. उन्होंने सवाल उठाया, “जब अन्य राज्यों के विस्थापित लोगों के लिए योजनाएं बन सकती हैं, तो छत्तीसगढ़ के प्रभावित लोगों के लिए क्यों नहीं?”
उन्होंने एक स्वतंत्र सर्वेक्षण की आवश्यकता पर बल दिया ताकि इन लोगों के सही आंकड़े एकत्र किए जा सकें और उन्हें आधिकारिक मान्यता और पुनर्वास पैकेज प्रदान किया जाए. उन्होंने कहा, “यह उन परिवारों के साथ न्याय होगा, जिनके जीवन सलवा जुडूम की आग में सबसे अधिक झुलसे हैं.”
इस बीच, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने तेलंगाना के भद्राद्रि कोठागुडेम जिले में रह रहे आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों से संबंधित भूमि अधिग्रहण के मामलों की सुनवाई 8 सितंबर को तय की है.
इस सुनवाई में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र के मुख्य सचिव मौजूद रहेंगे. आयोग ने कहा है कि अनुपस्थित रहने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.