पश्चिम बंगाल के शिक्षण संस्थानों में बढ़ा RSS का दखल
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद राज्य के राजनीतिक परिदृश्य के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों का माहौल भी तेजी से बदलने लगा है. दशकों तक वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रभाव में रहे बंगाल के परिसरों, स्टाफ रूमों और अकादमिक नेटवर्क में अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठनों ने अपनी पैठ मजबूत करनी शुरू कर दी है.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), भारतीय शिक्षण मंडल और अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) जैसे संगठनों ने अपने सदस्य अभियान और पहुंच में भारी उछाल दर्ज किया है.
चुनाव नतीजों के महज तीन हफ्ते के भीतर उत्तर बंगाल के कॉलेज कैंटीनों से लेकर कोलकाता के विश्वविद्यालय विभागों तक वैचारिक बदलाव साफ देखा जा रहा है. बंगाल की छात्र राजनीति में लंबे समय तक हाशिये पर रहने वाली एबीवीपी के पास अब सदस्यता के लिए लगातार अनुरोध और व्हाट्सएप पूछताछ आ रही है.
आरएसएस के वरिष्ठ नेता जिष्णु बसु के अनुसार, बंगाल वह भूमि है जहां राष्ट्रवाद और 'वंदे मातरम' का जन्म हुआ, और अब बंगाल अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है. एबीवीपी नेताओं का दावा है कि चुनाव से पहले राज्य के केवल 96 कॉलेजों में उनकी उपस्थिति थी, जो दो हफ्तों में बढ़कर 400 से अधिक हो गई है.
छात्र संगठन में शामिल होने के लिए टीएमसीपी और एसएफआई के पूर्व कार्यकर्ता भी संपर्क कर रहे हैं, हालांकि संगठन छवि खराब करने वाले तत्वों को दूर रखकर पूरी जांच-परख के बाद ही नए सदस्यों को शामिल कर रहा है.
शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच भी राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ और भारतीय शिक्षण मंडल की ताकत तेजी से बढ़ रही है. महासंघ का दावा है कि बंगाल में उनकी सदस्य संख्या, जो कभी 10,000 से कम थी, अब एक लाख को पार कर सकती है क्योंकि स्कूल और कॉलेज के कर्मचारी नए सत्ता ढांचे से जुड़ना चाहते हैं.
संगठन के राज्य महासचिव बापी प्रमाणिक के अनुसार, चुनाव के बाद मिले इस नए प्रोत्साहन ने उन जिलों में भी भर्ती को तेज कर दिया है जहां पहले इन संगठनों को पैर जमाने में संघर्ष करना पड़ता था. वहीं, भारतीय शिक्षण मंडल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के क्रियान्वयन को लेकर सक्रिय है, जिसका पहले राज्य सरकार द्वारा विरोध किया जा रहा था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ के लिए केवल प्रशासनिक सत्ता हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य नहीं था, बल्कि असली वैचारिक लड़ाई कक्षाओं, पाठ्यक्रमों, शिक्षक संघों और छात्रों की चेतना के भीतर है.
वामपंथियों ने 1960 और 1970 के दशक में जिस तरह शिक्षण संस्थानों के माध्यम से अपनी जड़ें जमाई थीं, ठीक वैसे ही अब दक्षिणपंथी संगठन भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं.
हालांकि विपक्षी दल इसे केवल सत्ता परिवर्तन के बाद का अस्थायी प्रभाव बता रहे हैं, लेकिन कैंपस के भीतर बदलते मिजाज को वे भी पूरी तरह नकार नहीं पा रहे हैं. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बंगाल की अगली पीढ़ी अपनी पुरानी वाम-उदारवादी राजनीतिक परंपरा को बनाए रखती है या राष्ट्रवादी राजनीतिक संस्कृति की ओर पूरी तरह कदम बढ़ा देती है.