वामपंथी विचारधारा से मुक्त नहीं हो पाए ऋतब्रत
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति में पाला बदलना और नई भूमिकाओं में ढलना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पूर्व वामपंथी नेता ऋतब्रत बनर्जी का विधानसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष पहला भाषण इस समय राज्य के सियासी गलियारों में गहरी चर्चा का विषय बन गया है. तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़े धड़े के नेता और नवनिर्वाचित विधानसभा में विपक्ष की आवाज बने ऋतब्रत ने बजट सत्र के अपने पहले ही वक्तव्य में जिस तरह से वामपंथी दर्शन और विचारकों का सहारा लिया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
सवाल यह उठ रहा है कि क्या ऋतब्रत आज भी अपनी पुरानी राजनीतिक विचारधारा के प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाए हैं, या फिर तृणमूल कांग्रेस का राजनीतिक स्वरूप ही ऐसा है जहां किसी कड़ी वैचारिक बंदिश के बजाय मुद्दों के आधार पर तालमेल बिठाया जाता है. इसी लचीलेपन के कारण ऋतब्रत एक राष्ट्रवादी दल में रहकर भी सहजता से वामपंथ की चर्चा करते नजर आए.
विधानसभा सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई बुनियादी मुद्दों पर तीखी लेकिन मर्यादित बहस देखने को मिली. कुणाल घोष सहित कई नेताओं ने राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखी और सदन की गरिमा बनी रही. हालांकि, ऋतब्रत बनर्जी के भाषण ने सबका ध्यान खींचा.
उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत हॉकर्स के अधिकारों और हाशिए पर मौजूद लोगों के संघर्ष से की. इसके बाद छात्र संघ चुनावों का जिक्र करते हुए उन्होंने सीधे तौर पर कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के सिद्धांतों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि दुनिया के इन दो महान विचारकों ने छात्र राजनीति को 'बैटल ऑफ आइडियाज' (विचारों की लड़ाई) कहा था.
ऋतब्रत के भाषण में 'मीन्स ऑफ प्रोडक्शन' (उत्पादन के साधन) और 'क्लास' (वर्ग) जैसे भारी-भरकम वामपंथी शब्दों का प्रयोग साफ बता रहा था कि इतने साल तृणमूल में रहने के बाद भी उनका पुराना वैचारिक प्रशिक्षण आज भी बेहद मजबूत है.
भाषण के अगले हिस्से में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' का उल्लेख किया. इसके बाद जब उन्होंने सुहरावर्दी रोड का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी के नाम पर करने का मुद्दा उठाया, तो भाजपा विधायकों ने इसका कड़ा विरोध किया.
तनावपूर्ण माहौल के बीच ऋतब्रत ने सुबेंदु अधिकारी की पुरानी बातों को याद दिलाते हुए मुख्यमंत्री के उस कथन का जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि सदन विपक्ष का होता है. उन्होंने कबीर सुमन के गीतों की पंक्तियों के जरिए विपक्ष को बोलने देने की वकालत की.
अपने भाषण के अंत में उन्होंने क्यूबा के महान क्रांतिकारी फिदेल कास्त्रो और उनके ऐतिहासिक अदालती भाषण "ला हिस्टोरिया मे एब्सॉल्वेरा" (इतिहास मुझे दोषमुक्त करेगा) का भी उल्लेख किया.
कुल मिलाकर, तृणमूल के झंडे तले राजनीति करने के बावजूद ऋतब्रत ने जीवन के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर वामपंथी विचारकों का ही सहारा लिया. इस पर बंगाल का वामपंथी नेतृत्व भले ही मन ही मन मुस्कुरा रहा हो, लेकिन अब असल चुनौती यह देखना है कि राजनीतिक रूप से अर्णब विश्वास, संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी जैसे अलग-अलग मिजाज के नेता एक साथ मिलकर आगे की राजनीति को किस तरह नया मोड़ देते हैं.