बागी TMC MLA ऋतब्रत बनर्जी बने रहेंगे नेता प्रतिपक्ष
कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की एक बड़ी खबर सामने आ रही है. कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राज्य विधानसभा अध्यक्ष रथिन बोस के उस फैसले पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जिसमें उन्होंने बागी तृणमूल कांग्रेस विधायक रीताब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता दी थी.
कोर्ट के इस फैसले को ममता बनर्जी और उनके गुट के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, जो इस पद पर शोभनदेव चट्टोपाध्याय को देखना चाहते थे.
न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अंतरिम रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया अंतरिम राहत देने का कोई मजबूत मामला नहीं बनता है और न ही संतुलन याचिकाकर्ता के पक्ष में है.
हालांकि, कोर्ट ने इस बड़े कानूनी और संवैधानिक सवाल की जांच करने का फैसला किया है कि क्या विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष को मान्यता देते समय अपने अधिकारों के दायरे में रहकर काम किया. इसके लिए अदालत ने सभी पक्षों से तीन सप्ताह के भीतर हलफनामा मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई तय की है.
यह कानूनी विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा के बजट सत्र के ठीक पहले दिन सामने आया है, जिसकी शुरुआत राज्यपाल आर. एन. रवि के अभिभाषण के साथ हुई. कोर्ट के इस फैसले के बाद ऋतब्रत बनर्जी का समर्थन कर रहे विधायकों ने इसे अपनी 'नैतिक जीत' बताया है.
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 80 सीटों पर जीत हासिल की थी. इसके बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए एक पत्र भेजा गया था. लेकिन ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने आरोप लगाया कि उस पत्र में उनके हस्ताक्षर जाली थे.
इस शिकायत के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. इसके बाद 3 जून को विधानसभा अध्यक्ष ने 58 विधायकों के समर्थन के आधार पर ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया, जो अब बढ़कर 65 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं.
इस बीच, पश्चिम बंगाल सीआईडी हस्ताक्षरों में धोखाधड़ी के आरोपों की जांच कर रही है और इस सिलसिले में अभिषेक बनर्जी से पूछताछ भी की जा चुकी है.