भारत में हर साल 17 लाख मौतें प्रदूषण के कारण
नई दिल्ली । डेस्क: कांग्रेस नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार को भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण के स्तर पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे एक गंभीर 'पर्यावरण-जन स्वास्थ्य संकट' करार दिया है. वैश्विक अध्ययनों और हालिया वायु गुणवत्ता आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि PM-2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) का बढ़ता स्तर देश के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है.
जयराम रमेश ने 'द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ' की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए बताया कि PM-2.5 की सघनता में प्रति 10 माइक्रोग्राम की वृद्धि से मृत्यु दर में 8.6% का इजाफा होता है.
उन्होंने चेतावनी दी कि लैंसेट काउंटडाउन 2025 के अनुमानों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 17.2 लाख लोगों की मौत PM-2.5 के संपर्क में आने से हो रही है, जो 2010 के बाद से 38% की वृद्धि है.
केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय संसद में प्रदूषण से होने वाली मौतों को सीधे तौर पर स्वीकार करने से इनकार करता रहा है, जबकि सरकार की अपनी संस्था आईसीएमआर (ICMR) ने लांसेट के निष्कर्षों का समर्थन किया है.
उन्होंने 'सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर' (CREA) के नए विश्लेषण को भी साझा किया, जिसमें अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 238 शहरों के आंकड़ों को बेहद 'परेशान करने वाला' बताया गया है.
जयराम रमेश ने मांग की है कि साल 2009 के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों में तत्काल सुधार किया जाए और राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत PM-2.5 पर विशेष ध्यान दिया जाए.
बता दें कि PM-2.5 का अर्थ है वे सूक्ष्म कण जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है, जो मानवीय बाल की मोटाई के लगभग 30वें हिस्से के बराबर होते हैं. ये इतने छोटे होते हैं कि नग्न आंखों से नहीं देखे जा सकते और हवा में लंबे समय तक तैरते रहते हैं.
जब हम सांस लेते हैं, तो ये कण हमारे नाक और गले के प्राकृतिक फिल्टरों को पार कर सीधे फेफड़ों की गहराई तक (एल्विओली) पहुंच जाते हैं और वहां से रक्तप्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं.
स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव अत्यंत गंभीर हैं. अल्पकालिक संपर्क में आने से आंखों, नाक और गले में जलन, खांसी और सांस फूलने जैसी समस्याएं होती हैं.
लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से फेफड़ों का कैंसर, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD), दिल का दौरा और स्ट्रोक जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के रोगियों के लिए यह घातक है क्योंकि यह शरीर के श्वसन और परिसंचरण तंत्र (circulatory system) को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा सकता है.