सऊदी और ईरान के बीच फंसा पाकिस्तान, क्या टूटेगा रक्षा समझौता?
इस्लामाबाद । डेस्क: मध्य पूर्व में गहराता युद्ध अब दक्षिण एशिया के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है, जिससे पाकिस्तान एक अभूतपूर्व कूटनीतिक और सैन्य संकट में घिर गया है. अमेरिकी-इजराइली हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत और उसके बाद ईरान द्वारा इजराइल एवं छह खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल हमलों ने इस्लामाबाद को कांटों की राह पर खड़ा कर दिया है.
पाकिस्तान के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक जटिल है क्योंकि उसकी सीमा ईरान के साथ 900 किलोमीटर लंबी है, जबकि सऊदी अरब के साथ उसका दशकों पुराना गहरा सैन्य और आर्थिक रिश्ता है. पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हस्ताक्षरित 'रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता' अब अपनी सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रहा है. इस समझौते के तहत किसी भी एक देश पर हमला दोनों पर हमला माना जाएगा, जो नाटो के अनुच्छेद 5 जैसी सामूहिक रक्षा की याद दिलाता है.
वर्तमान संघर्ष में पाकिस्तान की स्थिति उस समय और नाजुक हो गई जब ईरान ने खाड़ी देशों, विशेषकर सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शुरू किया. पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने तेहरान और रियाद के बीच 'शटल डिप्लोमेसी' के जरिए तनाव कम करने की कोशिश की है, लेकिन जमीनी हालात बिगड़ते जा रहे हैं. डार ने स्पष्ट रूप से ईरानी नेतृत्व को सऊदी अरब के प्रति पाकिस्तान की रक्षा प्रतिबद्धताओं की याद दिलाई है.
हालांकि, ईरान ने आश्वासन मांगा था कि सऊदी धरती का उपयोग उसके खिलाफ नहीं होगा, लेकिन 6 मार्च को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर ईरानी मिसाइल हमलों ने इन कूटनीतिक कोशिशों को करारा झटका दिया. इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर का रियाद दौरा यह संकेत देता है कि पाकिस्तान पर सक्रिय सैन्य भूमिका निभाने का दबाव बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के लिए यह 'दो नावों की सवारी' अब असंभव होती जा रही है. यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपने हवाई रक्षा तंत्र या सैनिकों को तैनात करता है, तो उसे सीधे तौर पर युद्ध का हिस्सा माना जाएगा. इसके गंभीर घरेलू परिणाम हो सकते हैं.
पाकिस्तान में शिया समुदाय की आबादी लगभग 15-20 प्रतिशत है, जो खामेनेई की हत्या के बाद पहले से ही सड़कों पर है. गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्रों में हुई हिंसा और कर्फ्यू इस बात का प्रमाण है कि ईरान के साथ किसी भी टकराव से पाकिस्तान में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.
इसके अलावा, ईरान समर्थित 'जैनाबियून ब्रिगेड' जैसे लड़ाके पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव को भड़का सकते हैं. वहीं दूसरी ओर, यदि पाकिस्तान सऊदी अरब की मदद से पीछे हटता है, तो रियाद के साथ उसके संबंध अपरिवर्तनीय रूप से खराब हो सकते हैं, जिससे लाखों पाकिस्तानी कामगारों का भविष्य और देश को मिलने वाली आर्थिक मदद संकट में पड़ जाएगी.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही भुगतान संतुलन के संकट से जूझ रही है और खाड़ी देशों से आने वाला रेमिटेंस उसकी जीवन रेखा है. युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतों में उछाल और क्षेत्रीय अस्थिरता पाकिस्तान को आर्थिक दिवालियेपन की ओर धकेल सकती है.
साथ ही, पश्चिमी सीमा पर अफगान तालिबान के साथ जारी सैन्य झड़पों ने पाकिस्तानी सेना के संसाधनों को पहले ही व्यस्त कर रखा है. विश्लेषकों का तर्क है कि पाकिस्तान के पास अब सीमित विकल्प बचे हैं. वह सीधे तौर पर ईरान पर हमला करने का जोखिम नहीं उठा सकता, इसलिए वह सऊदी अरब को खुफिया जानकारी या रक्षात्मक हवाई सहायता प्रदान करने जैसे गुप्त रास्ते चुन सकता है.
लेकिन जैसे-जैसे खाड़ी के ऊर्जा बुनियादी ढांचों पर हमले तेज होंगे, रियाद की ओर से 'औपचारिक सैन्य सहायता' की मांग तेज होगी. अंततः, यदि स्थिति 'ईरान या सऊदी' में से किसी एक को चुनने की आई, तो पाकिस्तान का झुकाव अपनी विश्वसनीयता और आर्थिक हितों के कारण सऊदी अरब की ओर हो सकता है, भले ही इसकी कीमत उसे आंतरिक अशांति के रूप में चुकानी पड़े?