कांगो में इबोला वायरस से 1,500 से ज्यादा की मौत
नई दिल्ली । डेस्क: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कांगो (डीआरसी) में इबोला वायरस का प्रकोप बेहद भयानक रूप ले चुका है. देश के संचार और मीडिया मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, अब तक इबोला के 3,532 से अधिक मामलों की पुष्टि हो चुकी है. इसके साथ ही यह इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा इबोला प्रकोप बन गया है.
इस घातक वायरस से अब तक 1,556 लोगों की जान जा चुकी है, जिससे इसकी मृत्यु दर बढ़कर लगभग 44.1 प्रतिशत हो गई है. वर्तमान में 807 से अधिक मरीज अस्पतालों में आइसोलेशन रखे गए हैं, जबकि 626 लोग इलाज के बाद स्वस्थ हुए हैं.
विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी प्रमुख कार्ल स्काऊ के अनुसार, यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला इबोला प्रकोप है और दुनिया को इस पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.
अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (अफ्रीका सीडीसी) का कहना है कि यह प्रकोप शुरू हुए अभी तीन महीने से भी कम समय हुआ है, लेकिन इस शुरुआती अवधि में ही इसने पिछले सालों की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों की जान ले ली है. इससे पहले केवल 2014-2016 के दौरान पश्चिम अफ्रीका (गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन) में आया इबोला प्रकोप इससे बड़ा था, जिसमें 28,000 से अधिक लोग प्रभावित हुए थे.
विशेषज्ञों की चिंता की मुख्य वजह यह है कि कांगो में इस बार इबोला का दुर्लभ 'बुंडीबुग्यो स्ट्रेन' फैला हुआ है, जिसके लिए वर्तमान में कोई स्वीकृत टीका या इलाज उपलब्ध नहीं है. इसके अलावा, पूर्वी कांगो के जिन पांच प्रांतों-हौट-उएले, इतूरी, नॉर्थ किवु, साउथ किवु और त्सोपो-में यह फैला हुआ है, वहां सशस्त्र समूहों की उपस्थिति के कारण स्वास्थ्य कर्मियों को हिंसा और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है.
विदेशी सहायता में कटौती के कारण संसाधनों की भारी कमी हो गई है, जबकि अफ्रीका सीडीसी के अनुमान के अनुसार इस संकट को नियंत्रित करने के लिए 1.4 अरब डॉलर की आवश्यकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने चेतावनी दी है कि वास्तविक आंकड़े आधिकारिक रिपोर्ट से चार गुना तक अधिक हो सकते हैं. स्थानीय स्तर पर जागरूकता की कमी, पारंपरिक चिकित्सकों पर निर्भरता और स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमलों ने इस महामारी को एक विकराल रूप दे दिया है.