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केरल में छात्राओं को मेंस्ट्रुअल लीव का विरोध शुरू

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01 जून 2026, 07:30 AM 2 मिनट में पढ़ें 3

आर श्रीलेखा
आर श्रीलेखा

तिरुवनंतपुरम । डेस्क: केरल सरकार द्वारा स्कूली छात्राओं के लिए प्रस्तावित मासिक धर्म अवकाश (मेंस्ट्रुअल लीव) की नीति पर राज्य में एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो गया है. पूर्व पुलिस महानिदेशक और भाजपा नेता आर. श्रीलेखा ने इस नीति का सार्वजनिक रूप से कड़ा विरोध किया है, जिसके बाद प्राइवेसी और महिला सशक्तिकरण को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है.


केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने हाल ही में विधानसभा में अपने नीतिगत संबोधन के दौरान यूडीएफ (UDF) सरकार के 'प्रोजेक्ट मेंस्ट्रुअल डिग्निटी' (मासिक धर्म गरिमा परियोजना) का एलान किया था. इस योजना के तहत स्कूली छात्राओं को हर महीने तीन दिन तक की छुट्टी देने का प्रस्ताव है.

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इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी आर. श्रीलेखा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस तरह की समर्पित छुट्टियों से छात्राओं के मासिक धर्म चक्र की जानकारी उनके परिवार, स्कूल और पड़ोसियों को आसानी से मिल जाएगी. उन्होंने इसे व्यक्तिगत गोपनीयता (प्राइवेसी) का उल्लंघन और छात्राओं के लिए असहज करने वाली स्थिति बताया. 


श्रीलेखा ने नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या यह वास्तव में लड़कियों को सशक्त बनाता है या फिर उन्हें अधिक कमजोर और दूसरों पर निर्भर दिखाता है? अपने स्कूल, कॉलेज और कठिन आईपीएस ट्रेनिंग के दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने या उनकी साथियों ने कभी पीरियड के दर्द के कारण ड्यूटी नहीं छोड़ी, और यही महिलाओं की 'असली ताकत' है.


श्रीलेखा ने सरकार को सुझाव दिया कि इस तरह की छुट्टी देने के बजाय स्कूलों और कॉलेजों में साफ-सुथरे शौचालय बनवाए जाने चाहिए, सेनेटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनें लगाई जानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर दर्द निवारक दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि यह कदम छात्राओं के साथ-साथ महिला शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए भी अधिक फायदेमंद होगा.


दूसरी तरफ, यूथ कांग्रेस के राज्य महासचिव दुल्किफिल वी.पी. ने पूर्व DGP के बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि मासिक धर्म एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है और आधुनिक, लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी है कि वह इस दौरान महिलाओं को आराम की सुविधा दे. 


दुल्किफिल ने श्रीलेखा पर निशाना साधते हुए कहा कि वे एक अनिवार्य मानवीय प्रक्रिया को 'शर्म' के रूप में पेश कर रही हैं, जिसे छिपाने की जरूरत बताई जा रही है. उन्होंने तर्क दिया कि देश की लाखों महिलाएं इस दौरान गंभीर दर्द और समस्याओं से गुजरती हैं, ऐसे में उन्हें आराम देना कोई सहानुभूति नहीं, बल्कि उनका मौलिक अधिकार है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP