सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला बदल देगा आदिवासियों की ज़िंदगी
आयुषी शर्मा | रायपुर : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आदिवासी महिला या उसके कानूनी उत्तराधिकारी, परिवार के पुरुषों की तरह ही पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं. छत्तीसगढ़ से जुड़े इस फैसले में कहा गया कि किसी आदिवासी महिला या उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को केवल लिंग के आधार पर पैतृक संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करना अनुचित और असंवैधानिक दोनों है.
यह फ़ैसला भारत में आदिवासियों के सामाजिक ताने-बाने को बदलने वाला फ़ैसला है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से पूरे देश के आदिवासी प्रभावित होंगे.
सुप्रीम कोर्ट के इस ताज़ा फैसले ने आदिवासी समाज में हलचल मचा दी है. बस्तर में आदिवासी नेताओं का कहना है कि इस फ़ैसले के दूरगामी परिणाम होंगे. वहीं कई आदिवासी नेताओं का कहना है कि वे इस फ़ैसले की समीक्षा करेंगे.
लेकिन इन बयानों से इतर पहले जानते हैं कि यह फ़ैसला है क्या.
1992 में छत्तीसगढ़ के सूरजपुर की रहने वाली एक आदिवासी महिला धईया के कानूनी उत्तराधिकारियों ने अपने नाना भज्जू उर्फ भंजन गोंड की पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगते हुए मुकदमा दायर किया. धईया के पांच भाई थे और कुल छह संतानें थीं. अक्टूबर 1992 में जब परिवार के पुरुष सदस्यों ने बंटवारे से इनकार कर दिया, तब यह विवाद शुरू हुआ.
मामला सूरजपुर की निचली अदालत में पहुंचा, जिसने 29 फरवरी 2008 को यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया कि वादकारियों ने गोंड समाज में ऐसी कोई परंपरा साबित नहीं की जिससे बेटी को संपत्ति में अधिकार मिलता हो.
अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 (2) के अनुसार, पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी का यह अधिनियम आदिवासियों पर लागू नहीं होता. इसके बाद 21 अप्रैल 2009 को प्रथम अपीलीय अदालत और फिर 1 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने भी यह फैसला बरकरार रखा. हाईकोर्ट ने कहा कि वादकारियों ने अपने अधिकार को साबित करने के लिए कोई परंपरा पेश नहीं की और यह भी जोड़ा कि “न्याय, समता और सद्भाव” के आधार पर दी गई दलील अब मान्य नहीं क्योंकि सेंट्रल प्रॉविंसेज लॉज एक्ट, 1875 को पहले ही रद्द किया जा चुका है.
हाईकोर्ट और निचली अदालतों के इन फैसलों से असंतुष्ट होकर, अपने नाना की संपत्ति में हक़ मांगने वाले आदिवासी धईया के बेटे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. अंततः 18 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि आदिवासी महिलाएं और उनके उत्तराधिकारी भी पुरुषों की तरह पैतृक संपत्ति में समान हिस्सेदारी के हकदार हैं.
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित करने वाली कोई प्रामाणिक परंपरा सिद्ध नहीं होती, तब तक समानता का सिद्धांत लागू रहेगा.
हाईकोर्ट और निचली अदालतों के निष्कर्षों को पलटते हुए, उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालतों के दृष्टिकोण की आलोचना की, जिसमें महिलाओं को उत्तराधिकार की अनुमति देने वाली प्रथा को साबित करने की आवश्यकता बताई गई थी.
कोर्ट ने यह भी कहा कि परंपराएं कानून की तरह समय के साथ बदलती हैं और अगर कोई परंपरा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे बनाए नहीं रखा जा सकता. यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14, जो समानता की गारंटी देता है, और अनुच्छेद 15 के अनुरूप माना गया है, जो धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है.
पीठ ने कहा कि मुकदमे में शामिल महिलाओं को पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण भी है. न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई प्रथा महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार को प्रतिबंधित करती है, तो उसे सिद्ध करने की जिम्मेदारी उस पक्ष की होगी जो इस अधिकार का विरोध कर रहा है.
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आदिवासी समुदायों में महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों को लेकर लंबे समय से चली आ रही असमंजस की स्थिति को समाप्त करता है, आदिवासी समुदायों में लैंगिक न्याय को लेकर चल रही बहस को नया दृष्टिकोण देता है. विशेष रूप से उस स्थिति में जब आदिवासी समुदायों के लिए कोई संहिताबद्ध व्यक्तिगत कानून मौजूद नहीं है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (एचएसए) की धारा 2(2) आदिवासियों को इसके दायरे से बाहर रखती है, जब तक कि केंद्र सरकार कोई विशेष अधिसूचना जारी न करे. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस प्रकार की "वैधानिक चुप्पी" को संस्थागत भेदभाव का आधार नहीं बनाया जा सकता.
हालांकि बस्तर में आदिवासी समाज से जुड़े नेताओं के पास अपने तर्क हैं.
कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के फ़ैसले की ज़रुरत ही नहीं है. वहीं कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इस फ़ैसले का स्वागत कर रहे हैं.
आदिवासी समाज से जुड़े नेताओं का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्वागत योग्य है. हालांकि इन नेताओं का कहना है कि इस फ़ैसले से पहले ही आदिवासी समाज में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हक मिलता रहा है.
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी. आदिवासी समाज में महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हक़ को अब जबकि सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी मिली है तो इस पर बहस भी शुरू होगी और शायद नए सिरे से कोई क़ानून भी बने.