छत्तीसगढ़ के बस्तर में सीआरपीएफ का नया जंगल वार फेयर कॉलेज
रायपुर | आयुषी शर्मा: छत्तीसगढ़ में भारत में अपनी तरह का एक और काउंटर टेररिज़्म एंड जंगल वार फेयर कॉलेज़ खोला जाएगा. सुरक्षाबलों के प्रशिक्षण के लिए खोले जाने वाला सीआरपीएफ का यह वार फेयर कॉलेज, बस्तर के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य के भीतर खोलने की तैयारी है. राज्य सरकार ने इस महीने की 4 तारीख को इसकी मंजूरी भी दे दी है. राज्य सरकार ने यह फैसला ऐसे समय में लिया है, जब राज्य के दूसरे अभयारण्यों में वन्यजीवों की उपस्थिति का हवाला दे कर सैकड़ों सालों से रह रहे आदिवासी गांवों को खाली करने की योजना पर काम चल रहा है.
2005 में कांकेर में बने पहले कॉलेज ने हज़ारों जवानों को गुरिल्ला से गुरिल्ला-स्टाइल में लड़ना सिखाया. लेकिन इस बार दांव और बड़ा है क्योंकि जगह वही है जहाँ छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु ‘वनभैंसा’ आख़िरी बार सांस ले रहा है, जहाँ आदिवासियों की पीढ़ियाँ सदियों से बसी हैं, और जहाँ हर पेड़, हर चट्टान, हर घाटी की अपनी कहानी है. अब सवाल उठ रहा है कि क्या ये नया कॉलेज इस जंगल को सुरक्षा की ढाल देगा, या फिर ये जंगल अपनी पहचान खो देगा?
छत्तीसगढ़ में 2005 में बस्तर के कांकेर इलाके में लगभग 300 एकड़ में काउंटर टेररिज़्म जंगल वार फेयर कॉलेज़ खोला गया था. यह काउंटर टेररिज़्म एंड जंगल वारफेयर कॉलेज विशेष रूप से नक्सलवाद और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए स्थापित किया गया था. इसका मूल सिद्धांत है-Fight the guerrilla like a guerrilla यानी गुरिल्ला से उसी की शैली में लड़ो.
इस कॉलेज की स्थापना और विकास ब्रिगेडियर बी.के. पोनवार के नेतृत्व में हुआ. पोनवार पहले मिज़ोरम के Counter Insurgency and Jungle Warfare School में तैनात रहे थे, और उन्होंने वहीं के मॉडल को छत्तीसगढ़ की परिस्थितियों के अनुसार ढालकर यहाँ लागू किया. इस तरह यह कॉलेज भारत में दूसरा बड़ा संस्थान बना, जो विशेष रूप से जंगल-युद्ध और काउंटर-इंसर्जेंसी में दक्षता विकसित करने पर केंद्रित है.
कॉलेज में प्रशिक्षण का स्वरूप अत्यंत कठोर और व्यावहारिक है. यहाँ पर छत्तीसगढ़ पुलिस, स्पेशल टास्क फोर्स, केंद्रीय अर्धसैनिक बल जैसे सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, और समय-समय पर अन्य राज्यों की पुलिस तथा राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड यानी एनएसजी के जवान भी प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं. प्रशिक्षण की अवधि सामान्यतः 45 दिनों की होती है. इसमें जवानों को दिन-रात जंगल में रहने, गुरिल्ला रणनीतियों को समझने, घात लगाना और उससे बचना, ट्रैकिंग, सर्वाइवल स्किल्स, हथियार चलाना, नक्शा-पढ़ना और जंगल में सामरिक मूवमेंट जैसी विधाओं में प्रशिक्षित किया जाता है.
यह कॉलेज केवल एक छोटे से कैंपस तक सीमित नहीं है. इसके प्रशिक्षण क्षेत्र का विस्तार आसपास के पूरे परिदृश्य तक है. रिपोर्ट्स के अनुसार इस इलाके में लगभग 65 गाँव आते हैं, तथा प्रशिक्षण क्षेत्र में करीब 75 पहाड़ी चोटियाँ/टॉप साइट्स शामिल हैं. यानी यहाँ जवान केवल बैरकों या सीमित फायरिंग रेंज में अभ्यास नहीं करते, बल्कि उन्हें वास्तविक जंगल और पहाड़ी इलाके में ही प्रशिक्षण दिया जाता है. इसमें शामिल हैं एम्बुश-साइट्स यानी जहाँ घात लगाकर हमला करने और उससे बचने का अभ्यास कराया जाता है. इसके अलावा फायरिंग-रेंज, जंगल-ट्रैक और गश्ती मार्ग, तथा कठिन परिस्थितियों में कैसे बचा जाए, उसका प्रशिक्षण दिया जाता है. इस प्रकार कॉलेज का प्रशिक्षण क्षेत्र वास्तव में एक जीवंत प्रयोगशाला की तरह है, जो जवानों को वास्तविक जमीनी परिस्थितियों से रूबरू कराता है.
एक बैच में अक्सर 400–500 जवान तक होते हैं. शुरुआती एक दशक में ही इस संस्थान से दसियों हज़ार जवान प्रशिक्षित होकर निकले, जिन्होंने नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कार्यक्षमता को काफी बढ़ाया.
लेकिन इस वार फेयर कॉलेज के कारण वन्यजीवों के साथ टकराव की घटनाएं भी लगातार बढ़ी हैं. लगभग 600 एकड़ के इलाके में प्रशिक्षण और संबंधित गतिविधियों के कारण कॉलेज के इलाके में भालुओं के साथ टकराव, उनके हमले बढ़े हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस कॉलेज की स्तापना के बाद कांकेर शहर में भी वन्यजीवों की आमद बढ़ी है.
सीआरपीएफ का नया कॉलेज
बहरहाल, अब छत्तीसगढ़ में सुरक्षाबलों के प्रशिक्षण का एक और केंद्र खुलने जा रहा है और यह इंद्रावती टाइगर रिजर्व के कोर का इलाका है. सीआरपीएफ ने इसी साल जुलाई में पामेड़ के ताड़पाला गांव के पास लगभग 700 एकड़ ज़मीन की मांग इसके लिए की है.
मंगलवार को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई वाइल्डलाइफ बोर्ड की बैठक में इसका विस्तृत प्रस्ताव पेश किया गया. बैठक में जानकारी दी गई कि सीआरपीएफ के प्रस्ताव का पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य ने परीक्षण किया और पाया कि यह नक्सली गतिविधियों का केंद्र बिंदु बन गया है, जिसके कारण वन्यजीव प्रबंधन, सर्वेक्षण और निगरानी न केवल मुश्किल है, बल्कि अत्याधिक जोखिमपूर्ण भी है.
वन विभाग ने कहा कि यहां प्रशिक्षण एवं कैंपिंग आधार स्थापित होना अत्यावश्यक है. इससे न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में वन और वन्यजीव प्रबंधन भी अधिक सुदृढ़ होगा.
बहरहाल, इस जंगलवार फेयर कॉलेज के लिए पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य के 11 कंपार्टमेंट को पामेड़ अभयारण्य से अलग किए जाएंगे, जहां यह जंगलवार फेयर कॉलेज बनाया जाएगा. मंगलवार को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद इस प्रस्ताव को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड को भेजा जा रहा है.
केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश से माओवाद को खत्म करने की समय सीमा तय की है. ऐसे में टाइगर रिजर्व से संबद्ध कोर इलाके में 700 एकड़ में जंगल वार फेयर कॉलेज का वन्यजीवों पर क्या असर होगा, इसे लेकर राज्य सरकार के पास कोई जानकारी नहीं है. छत्तीसगढ़ में लुप्तप्राय राजकीय पशु वनभैंसा केवल इसी पामेड़ इलाके में बचा हुआ है. दूसरे वन्यजीवों का भी यह आश्रय स्थल है. ज़ाहिर है, 700 एकड़ का इलाके में सुरक्षाबलों का प्रशिक्षण केंद्र, वन्यजीवों को भी प्रभावित करेगा ही. इलाके में रहने वाले आदिवासी भी प्रभावित होंगे ही.
पामेड़ में बनने वाला यह कॉलेज सुरक्षाबलों को ताक़त देगा, लेकिन साथ ही यह भी तय करेगा कि बस्तर का जंगल सिर्फ़ युद्ध का मैदान बनेगा या फिर जीवन और जैव विविधता का घर भी बचा रहेगा. आख़िरकार, सवाल यही है नक्सलियों के ख़िलाफ़ जंग जीतने की इस रणनीति में, कहीं हम जंगल, वन्यजीव और उसके वाशिंदों को तो नहीं हार रहे? उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य सरकार इन सबके लिए भी कोई विस्तृत कार्ययोजना ज़रूर तैयार करेगी.