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दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ती मोदी सरकार

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20 जून 2026, 05:41 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

मोदी-शाह
मोदी-शाह

नई दिल्ली । डेस्क: देश की सियासत में इन दिनों एक बड़ा भूचाल आया हुआ है. विपक्षी दलों में लगातार हो रही बड़ी बगावत और टूट ने केंद्र की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. सरकारी हलकों में इस बात को लेकर भारी आत्मविश्वास देखा जा रहा है कि अगले महीने शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र तक सरकार के पास संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा होगा. 


उम्मीद की जा रही है कि सरकार इस मानसून सत्र तक महिला आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या बल जुटा लेगी. इसके साथ ही, भाजपा एक और बड़े ऐतिहासिक कदम की तैयारी में है. 


पार्टी साल 2029 के आम चुनाव से पहले देश भर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने यानी 'एक देश, एक चुनाव' (One Nation One Election) के कानून को अमलीजामा पहनाना चाहती है. इसके लिए भी संविधान में बदलाव की जरूरत होगी, जिसके लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत अनिवार्य है.


वर्तमान में 540 की प्रभावी संख्या वाली लोकसभा में एनडीए के पास 293 सदस्य हैं, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 वोटों की आवश्यकता है. सूत्रों का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 में से 20 सांसद और शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 सांसद जल्द ही पाला बदल सकते हैं, जिससे एनडीए का आंकड़ा 319 तक पहुंच जाएगा. 


इसके अलावा, भाजपा रणनीतिकारों को भरोसा है कि समाजवादी पार्टी (सपा) समेत कई अन्य विपक्षी दलों में भी जल्द ही बड़ी टूट देखने को मिल सकती है. 


दूसरी तरफ, 245 सदस्यीय राज्यसभा में एनडीए 164 के दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के बेहद करीब पहुंच चुका है. आम आदमी पार्टी (AAP) के 10 में से 7 सांसदों के पाला बदलने और हालिया चुनावों में मिली जीत के बाद उच्च सदन में एनडीए की ताकत 152 हो चुकी है.


राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा के लिए परिसीमन और एक साथ चुनाव कराना भविष्य के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है. पार्टी के कुछ अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद के दौर के लिए यह कदम बेहद अहम है, क्योंकि उनके उत्तराधिकारी के पास शायद मोदी जैसा व्यापक जन-आकर्षण न हो. 


विपक्षी दल इस परिसीमन को लेकर आशंकित हैं और इसे असम मॉडल की तरह निर्वाचन क्षेत्रों को अपने राजनीतिक फायदे के लिए बदलने की साजिश बता रहे हैं. हालांकि, सरकार का कहना है कि 1971 की जनगणना के बाद से सीटें फ्रीज हैं, इसलिए बढ़ती आबादी को देखते हुए नया परिसीमन अब बेहद जरूरी हो चुका है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP