रवि, 18 अक्टू. 2026

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कोयला खनन की मार झेलता कोरबा, 35 प्रतिशत घटा जंगल

छत्तीसगढ़ का कोरबा कोयला उत्पादन के चलते तबाही के कगार पर

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21 जुल. 2025, 07:47 AM 6 मिनट में पढ़ें 3

कोयला खनन से तबाह कोरबा
कोयला खनन से तबाह कोरबा

कोरबा | आयुषी शर्मा : पूरे देश में सबसे ज्यादा कोयला उत्पादन करने वाला छत्तीसगढ़ का कोरबा आज खुद गंभीर हालात से गुजर रहा है. कोयला खनन पर पिछले 29 साल के आंकड़ों पर आधारित एक नए व्यापक शोध से सामने आया है कि कोरबा में वन क्षेत्र 35.56% से घटकर सिर्फ 14.06% रह गया है. दूसरी ओर खनन क्षेत्र 2.52% से बढ़कर 8.69% तक पहुंच गया है.


यह तब है, जब सरकार लगातार कहती रही है कि वह कोयले पर निर्भरता कम कर रही है.

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2013-14 में देश में कोयला उत्पादन 567.765 मिलियन टन था, जो 2023-24 में बढ़ कर 997.826 मिलियन टन हो गया. जबकि भारत सरकार ने अगले कुछ सालों में कोयले पर निर्भरता को 50 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है.


कोयला खनन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है और इसकी कीमत, जाहिर तौर पर स्थानीय लोग चुका रहे हैं.


अब एक व्यापक शोध से यह जानकारी सामने आई है कि कोरबा में वन आवरण 35.56% से घटकर 14.06% रह गया है. इसके विपरीत हर साल लाखों की संख्या में पौधे लगाने का दावा किया जाता है.


अमरकंटक की इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी के तरुण कुमार ठाकुर, दिग्वेश कुमार पटेल और अनिता ठाकुर, ग्राम्य भारती कॉलेज कोरबा की रानू राठौर, ताइवान की नेशनल ताइवान नॉर्मल यूनिवर्सिटी के किरण कुमार इरीपोगु, संत गहिरा गुरु सरगुजा विश्वविद्यालय के जोयस्तू दत्ता और एचएनबी गढ़वाल यूनिवर्सिटी के मुनेश कुमार ने एक व्यापक शोध के बाद यह निष्कर्ष निकाला है.


पारिस्थितिक तंत्र को तहस-नहस करता खनन

अध्ययन में पिछले 29 वर्षों के सैटेलाइट डेटा, लैंड यूज और वन आवरण में हुए बदलावों का गहराई से अध्ययन किया गया है. इस अध्ययन में कहा गया है कि कोयला खनन की पर्यावरणीय कीमत बहुत अधिक रही है. विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के कोरबा क्षेत्र में, जहां कोयला खनन ने भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC)पैटर्न को बुरी तरह से बदल दिया है.


कोरबा में खनन गतिविधियों के कारण व्यापक भूमि क्षरण, आवास विनाश, मिट्टी का कटाव, और जैव विविधता हानि देखी गई है.


वन और कृषि भूमि को खनन स्थलों और शहरी बस्तियों में परिवर्तित किया गया है, जिससे जल प्रतिधारण, मिट्टी स्थिरता और जैव विविधता जैसी पारिस्थितिक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है.


वन क्षेत्र घटा और खनन क्षेत्र बढ़ा

इस शोध के अनुसार 1995 से 2024 तक, वन आवरण 35.56 प्रतिशत यानी 178.65 वर्ग किलोमीटर से घटकर 14.06 प्रतिशत यानी 70.65 वर्ग किलोमीटर रह गया है. जबकि खनन क्षेत्र 12.65 वर्ग किमी यानी 2.52 फीसदी से बढ़कर 43.65 वर्ग किमी यानी 8.69 प्रतिशत हो गया.


इस अध्ययन में कहा गया है कि कोरबा की गेवरा, कुसमुंडा और दीपका खदानें हर साल 145-155 मिलियन टन कोयला देती हैं, जो देश के कुल उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा है. लेकिन यह कोयला सिर्फ ऊर्जा नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर मिट्टी का कचरा, जहरीली धूल और भारी प्रदूषण भी छोड़ता है.


ओपन-कास्ट खनन, भूमिगत खनन से 8-10 गुना ज्यादा कचरा पैदा करता है, जिससे जंगल और मिट्टी तेजी से खत्म होते हैं.


कृषि क्षेत्र घटा-बंजर भूमि में इज़ाफा

इस अध्ययन के अनुसार कोरबा में कृषि भूमि का क्षेत्र 1995 में 18.05% था, जो 2024 में घटकर 12.01% रह गया. यह खेती की ज़मीन में निरंतर गिरावट को दर्शाता है. इसी तरह बस्तियाँ और कस्बों का क्षेत्रफल 1995 के 3.71% से बढ़कर 2024 में 6.88% पर पहुंच गया.


इसी तरह ओवरबर्डन डंप का क्षेत्र भी 0.55% से बढ़कर 1.72% हो गया. कोयला खनन के कारण बंजर भूमि में भी तेज़ी से इज़ाफा हुआ. 1995 में यह 4.79% थी, जो 2024 तक 13.35% हो गई.


जल स्रोतों का क्षेत्र हालांकि 1995 के मुकाबले थोड़ा घटा और फिर थोड़ा बढ़ा, लेकिन कुल मिलाकर यह 3.06% से गिरकर 2.24% रह गया.


दुनिया की बात करें तो वैश्विक स्तर पर, 23% भूमि संसाधन क्षरण से प्रभावित हैं, जबकि भारत में 44% भूमि क्षेत्र वनों की कटाई, अत्यधिक खनन, तेजी से औद्योगीकरण, और असंतुलित भूमि उपयोग प्रथाओं के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है और कोरबा इसका उदाहरण है.


शहरी क्षेत्रों में वृद्धि और बढ़ता प्रदूषण

इस शोध में दावा किया गया है कि कोरबा क्षेत्र में खनन गतिविधियों ने प्राकृतिक परिदृश्यों को औद्योगिक क्षेत्रों में बदल दिया है. ओवरबर्डन डंप, जो कोयला सीमा तक पहुँचने के लिए हटाई गई मिट्टी और चट्टानों से बनते हैं, उसके कारण विषाक्त भारी धातु और प्रदूषक जमा हुए. इससे मिट्टी का कटाव, आवास विनाश और जल निकायों का प्रदूषण बढ़ा है.


कोरबा में कोयला खनन के कारण भूमि उपयोग और भूमि आवरण परिवर्तन की बात करें तो एक तरफ जहां वन आवरण कम हुआ, खनन का रकबा बढ़ा, वहीं बंजर भूमि और शहरी क्षेत्रों में भी वृद्धि हुई.


क्रॉस-मैट्रिक्स और परिवर्तन नक्शों से पता चलता है कि वन क्षेत्र मुख्य रूप से खनन स्थलों में परिवर्तित हुए, जबकि कृषि भूमि बंजर भूमि या शहरी बस्तियों में बदल गई. यह परिवर्तन जैव विविधता और पारिस्थितिक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव डालता है.


स्थानीय समुदायों व किसानों की आजीविका का सवाल

इस अध्ययन से पता चला कि कोयला खनन ने कोरबा के स्थानीय समुदायों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव डाला है. वन क्षेत्रों के नुकसान के कारण गैर-लकड़ी वन उत्पादों जैसे महुआ, बांस, और औषधीय पौधों की कमी के कारण समुदायों की आय पर नकारात्मक असर पड़ा है.


खनन गतिविधियों के कारण विस्थापन और नई बस्तियों का निर्माण भी सामाजिक तनाव का कारण बना है. ओवरबर्डन डंप और खनन के कचरे ने कृषि भूमि को बंजर बना दिया, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित हुई है.


जल निकायों का प्रदूषण ने पेयजल और सिंचाई की उपलब्धता को कम किया है, जिससे स्थानीय समुदायों के लिए और अधिक चुनौतियाँ पैदा हुई हैं.


इस तरह से हो सकता है सुधार

इस अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि जैविक खाद, बायोचार और अजैविक जैसे जिप्सम व चूना जैसे मिट्टी संशोधनों का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता और जल प्रतिधारण क्षमता में सुधार किया जा सकता है.


इसी तरह टेरेसिंग और चेक डैम, मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करते हैं. आम और इसी तरह के आर्थिक और औषधीय मूल्य वाली पेड़ की प्रजातियाँ स्थानीय समुदायों को आजीविका प्रदान कर सकती हैं.


सामुदायिक वन प्रबंधन और आय-सृजन गतिविधियों के माध्यम से, सामाजिक-आर्थिक लाभ सुनिश्चित किए जा सकते हैं.


क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली का वादा

इस इलाके की ड्रोन और रिमोट सेंसिंग तकनीकों का उपयोग करके वनस्पति विकास, मिट्टी स्वास्थ्य, और जल गुणवत्ता की निगरानी की जा सकती है. भारत ने 2021-2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली का वादा किया है. कोरबा में पुनर्बहाली प्रयास, इन वैश्विक लक्ष्यों को प्राप्त करने में योगदान दे सकते हैं.


कोरबा पर किए गए इस अध्ययन को सरकार अगर गंभीरता से ले तो राज्य की बेहतरी की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाया जा सकता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP