इजरायली सैनिकों ने फिलिस्तीनी बच्चों को मारकर कहा- हमने कुत्तों को मार डाला
नई दिल्ली । डेस्क: वेस्ट बैंक के तमुन गांव से मानवता को शर्मसार करने वाली एक ऐसी घटना सामने आई है, जो इजरायली सैन्य तंत्र के भीतर पनप रही गहरी क्रूरता और मानसिक विकृति को उजागर करती है. एक साधारण फिलिस्तीनी परिवार, जो केवल अपने बच्चों के साथ एक सामान्य दिन बिताकर घर लौट रहा था, इजरायली सैनिकों की अंधाधुंध गोलीबारी का शिकार हो गया.
इस हमले में 37 वर्षीय अली खालिद बनी ओदेह, उनकी पत्नी वाड और उनके दो मासूम बेटे 5 वर्षीय मोहम्मद और 7 वर्षीय उस्मान की मौके पर ही मौत हो गई. इन सभी के सिर में बेहद करीब से गोलियां मारी गईं, जो यह दर्शाता है कि यह कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि सीधे तौर पर खत्म कर देने की मंशा थी.
इस भयावह कत्लेआम के बीच जो सबसे विचलित करने वाली बात सामने आई, वह उन सैनिकों का व्यवहार था. हमले में जीवित बचे 12 वर्षीय खालिद ने अस्पताल के बिस्तर से जो गवाही दी है, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली है. खालिद ने बताया कि जब उसके माता-पिता और भाई गोलियों की बौछार से शांत हो गए, तब सैनिकों ने उसे और उसके छोटे भाई मुस्तफा को कार से बाहर घसीटा. घायल और डरे हुए बच्चों को सहारा देने के बजाय, सैनिकों ने उन्हें बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया.
खालिद के अनुसार, वे सैनिक अपनी इस हैवानियत पर शर्मिंदा होने के बजाय चिल्लाकर जश्न मना रहे थे और कह रहे थे, "हमने कुत्तों को मार डाला."
यह शब्द उस नफरत और कट्टरता का प्रमाण हैं, जिसने सैनिकों को इतना अंधा कर दिया है कि उन्हें छोटे बच्चे और बेगुनाह नागरिक भी 'जानवर' नजर आने लगे हैं.
यह घटना केवल एक सैन्य चूक नहीं, बल्कि उस अमानवीय विचारधारा का परिणाम है जो लंबे समय से चल रहे संघर्ष और हालिया युद्धों के बीच सैनिकों के भीतर कूट-कूट कर भर दी गई है.
इजरायली सेना ने हमेशा की तरह इस नरसंहार को भी 'आतंकवाद विरोधी अभियान' का नाम देकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की है, लेकिन एक निहत्थे परिवार पर, जिसमें महिलाएं और बच्चे शामिल थे, इस तरह की दरिंदगी करना उनके मानसिक संतुलन और नैतिक पतन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
फिलिस्तीनी विदेश मंत्रालय ने भी इसे एक सोची-समझी आक्रामकता का हिस्सा बताया है. दुनिया के सामने यह सवाल अब बड़ा होता जा रहा है कि क्या ये सैनिक वास्तव में सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं या वे एक ऐसी हिंसक मानसिकता का शिकार हो चुके हैं जहाँ मासूमों की जान लेना उनके लिए गर्व की बात बन गई है.