क्या अमेरिका और चीन के बीच 'जी2' युग की शुरुआत हो रही है?
बीजिंग । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को बीजिंग पहुंच रहे हैं, जहां वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे. व्यापार युद्ध पर हुए संघर्ष विराम के छह महीने बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली आमने-सामने की बातचीत है. यह बैठक एक ऐसे समय में हो रही है जब ट्रंप प्रशासन मध्य पूर्व के संकट और इजरायल-ईरान युद्ध के कारण घरेलू स्तर पर असंतोष का सामना कर रहा है और उसे एक बड़ी विदेश नीति की जीत की सख्त जरूरत है.
दूसरी ओर, चीन की अर्थव्यवस्था भी इस युद्ध और हॉर्मुज जलडमरूमध्य की बंदी के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे उसकी कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हुई है. इस पृष्ठभूमि में आयोजित हो रहा यह शिखर सम्मेलन न केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इस मुलाकात ने एक बार फिर 'ग्रुप ऑफ टू' या 'जी2' की अवधारणा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. जी2 का विचार मूल रूप से 2005 में अमेरिकी अर्थशास्त्री सी. फ्रेड बर्गस्टेन द्वारा प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच वैश्विक बाजारों को स्थिर करने और साझा चुनौतियों से निपटने के लिए जिम्मेदारी साझा करना था.
ओबामा प्रशासन के दौरान इस पर काफी काम हुआ, लेकिन बाद के वर्षों में दोनों देशों के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था. अब, जब ट्रंप नाटो से अलग होने की धमकी दे रहे हैं और अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों से दूर होता दिख रहा है, तो चीन के साथ एक अनौपचारिक 'जी2' गठबंधन की संभावनाओं ने दुनिया भर के नीति विश्लेषकों का ध्यान खींचा है.
हालांकि, विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इस 'जी2' की संभावना को लेकर संशय में है. विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक किसी नए युग की शुरुआत के बजाय केवल 'रणनीतिक टोह' लेने की एक प्रक्रिया है, जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की 'रेड लाइन्स' और बर्दाश्त करने की सीमा को परख रहे हैं.
ट्रंप जहां अमेरिका को दुनिया की सर्वोच्च शक्ति के रूप में फिर से स्थापित करना चाहते हैं, वहीं शी जिनपिंग चीन को वैश्विक पटल पर एक समान हैसियत दिलाने के लिए प्रयासरत हैं. इन दोनों महत्वाकांक्षाओं का एक साथ सफल होना कठिन है.
इसके अलावा, चीन हमेशा से बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और संयुक्त राष्ट्र की सर्वोपरि भूमिका का समर्थक रहा है, ऐसे में वह केवल अमेरिका के साथ मिलकर दुनिया को चलाने वाले किसी भी द्वि-ध्रुवीय ढांचे में शामिल होने से हिचकिचा सकता है.
बाकी दुनिया, विशेष रूप से यूरोप, भारत, जापान और ब्राजील जैसे देश, अमेरिका-चीन के बीच किसी भी संभावित 'जी2' गठबंधन को गहरी चिंता के साथ देख रहे हैं. उन्हें डर है कि दो महाशक्तियों के बीच होने वाले सौदे उनकी अपनी अर्थव्यवस्थाओं और हितों को हाशिए पर धकेल सकते हैं.
यूरोपीय संघ पहले से ही ऊर्जा और दुर्लभ खनिजों के लिए अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, जबकि भारत और ब्राजील जैसे देश अपने स्वयं के वैश्विक प्रभुत्व की आकांक्षा रखते हैं.
'ग्लोबल साउथ' के देश भी एक ऐसी दुनिया नहीं चाहते जो दो महाशक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों में बंटी हो. कुल मिलाकर, ट्रंप और शी की यह मुलाकात तनाव कम करने का एक जरिया तो बन सकती है, लेकिन एक औपचारिक 'जी2' का निर्माण फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आता है, क्योंकि तकनीक, सुरक्षा और व्यापार पर दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास अभी भी कायम है.