नेपाल NHRC: पूर्व पीएम और पूर्व मंत्रियों के खिलाफ सिफारिश
काठमांडू । डेस्क: नेपाल के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने पिछले साल 8 और 9 सितंबर को हुए 'जनरेशन जेड' (Gen Z) विरोध प्रदर्शनों के दौरान मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का दोषी पाते हुए देश के शीर्ष राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व के खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की है. आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला है कि इन हिंसक घटनाओं और मानवाधिकार हनन के लिए पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक और पूर्व संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग मुख्य रूप से जिम्मेदार थे.
आयोग की सदस्य लिली थापा के नेतृत्व में गठित एक विशेष समिति द्वारा तैयार की गई इस जांच रिपोर्ट में न केवल राजनीतिक नेतृत्व, बल्कि देश के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों को भी कठघरे में खड़ा किया गया है.
एनएचआरसी ने नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक (IGP) दान बहादुर कार्की और सशस्त्र पुलिस बल (APF) के महानिरीक्षक नारायण दत्त पौडेल के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की है. इसके अतिरिक्त, कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने और मानवाधिकारों के हनन को रोक न पाने के आरोप में पूर्व नेपाल पुलिस प्रमुख चंद्र कुबेर खापुंग, पूर्व सशस्त्र पुलिस बल प्रमुख राजू अर्याल और पूर्व राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग प्रमुख हुत राज थापा को 'निगेटिव लिस्ट' (काली सूची) में डालने की सिफारिश की गई है.
इस सूची में शामिल होने के बाद ये पूर्व अधिकारी भविष्य में किसी भी सार्वजनिक या सरकारी पद पर नियुक्ति या नामांकन के लिए अयोग्य हो जाएंगे.
रिपोर्ट में तत्कालीन उप महानिरीक्षक (DIG) ओम बहादुर राणा, तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) विश्व अधिकारी, सशस्त्र पुलिस बल के पुलिस अधीक्षक (SP) जीबन केसी, राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग के निदेशक कृष्ण खनाल और काठमांडू के तत्कालीन मुख्य जिला अधिकारी (CDO) छबिलाल रिजाल सहित कई अन्य वरिष्ठ और मैदानी कमांडरों के खिलाफ भी संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं.
आयोग ने स्पष्ट किया है कि तत्कालीन सरकार प्रदर्शनों के पैमाने और युवाओं के आक्रोश का सही अनुमान लगाने में पूरी तरह विफल रही, जिसके कारण बड़े पैमाने पर जनहानि और संपत्ति का नुकसान हुआ.
मानवाधिकार आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कानूनी सुधारों की वकालत की है, जिसमें दोषी अधिकारियों के लिए छह महीने तक की जेल या 3 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान और इन मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत की स्थापना करना शामिल है.