कर्ज के जाल में भारतीय मिडिल क्लास
मुंबई । डेस्क: भारत की मध्यम वर्गीय आबादी तेजी से कर्ज के जाल में फंसती जा रही है. और इसके लिए कोई बाहरी ताकत नहीं, बल्कि उनकी अपनी मानसिकता जिम्मेदार है. मुंबई के डेटा साइंटिस्ट मोनिश गोसर ने एक लिंक्डइन पोस्ट में इस मुद्दे पर तीखा प्रहार किया है. उनका कहना है कि मध्यम वर्ग की "खुद की इच्छा से भागीदारी" उनकी आर्थिक तबाही का कारण बन रही है.
गोसार के अनुसार, पिछले चार वर्षों में भारत का क्रेडिट कार्ड कर्ज 2.92 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जबकि पर्सनल लोन में 75 फीसदी की वृद्धि हुई है. लेकिन उनका तर्क है कि बैंकों ने किसी को जबरदस्ती नहीं फंसाया. "बैंकों ने हमें रस्सी दी, और हमने खुद फंदा बनाया," वे लिखते हैं.
उनका मुख्य निशाना वह सोच है जो 10 लाख रुपये की कार को मेहनत का "हकदार" इनाम मानती है. गोसार एक दोस्त का उदाहरण देते हैं, जो 15 लाख रुपये सालाना कमाने के बावजूद एक पुरानी कार के बजाय नई कार खरीदने का फैसला करता है, यह कहकर कि "मैं इसके लायक हूँ." गोसार इसे सिस्टम की जीत बताते हैं.
वे कहते हैं कि मध्यम वर्ग ने अपनी जरूरतों को चाहतों के साथ भ्रमित कर लिया. "हमने इंस्टाग्राम को अपने वित्तीय लक्ष्य तय करने दिए. हमने भावनात्मक फैसले लिये और गणित को नजरअंदाज किया," वे लिखते हैं.
निवेशक सौरभ मुखर्जिया के अनुसार, भारत के मध्यम वर्ग का 5-10 फीसदी हिस्सा अब कर्ज के चक्र में फंसा है, न कि संपत्ति बनाने के लिये, बल्कि जीवनशैली की झूठी छवि बनाये रखने के लिये. ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खतरे के बीच नौकरी की सुरक्षा कमजोर होने से "वेतनभोगी रोजगार का अंत" हो रहा है, मुखर्जिया चेतावनी देते हैं.
गोसार का संदेश साफ है- मध्यम वर्ग को अपनी वित्तीय तबाही से बचने के लिये अपनी मानसिकता और फैसलों पर पुनर्विचार करना होगा.