मध्य-पूर्व से जल्दबाजी में कच्चा तेल नहीं खरीदेगा भारत
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद हॉर्मुज जलडमरूमध्य के दोबारा खुलने की उम्मीदें बढ़ गई हैं. इसके बावजूद, भारत की सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनियां मध्य-पूर्व के देशों से कच्चा तेल खरीदने की कोई जल्दबाजी में नहीं हैं.
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों ने अगले दो महीनों के लिए तेल का पर्याप्त स्टॉक सुरक्षित कर लिया है.
मामले से जुड़े लोगों के अनुसार, अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (Adnoc) सहित मध्य-पूर्व के कई प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं ने भारतीय रिफाइनरियों से दीर्घकालिक समझौतों के तहत अपनी तय मात्रा उठाना शुरू करने का अनुरोध किया है.
हालांकि, भारतीय कंपनियों ने अभी तक इस पर कोई अंतिम प्रतिबद्धता नहीं जताई है. केंद्र सरकार ने भी अभी तक यह तय नहीं किया है कि इस क्षेत्र में भारतीय जहाजों को भेजना कब से पूरी तरह सुरक्षित होगा. दरअसल, भारत आमतौर पर मध्य-पूर्व से 'लोडिंग बेसिस' पर तेल खरीदता है, जिसका मतलब है कि जहाजों और परिवहन की व्यवस्था खुद खरीदार को करनी होती है.
तनाव कम होने के बाद भी वैश्विक बाजार में मालवाहक जहाजों के किराए में बढ़ोतरी देखी जा रही है, क्योंकि युद्धविराम कितना लंबा टिकेगा, इसे लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए रूस जैसे देशों से मिलने वाला सस्ता तेल अधिक आकर्षक बना हुआ है.
रूसी तेल भारत को 'डिलीवर्ड बेसिस' (जिसमें परिवहन का जिम्मा विक्रेता का होता है) पर मिलता है. हालांकि रूस पर अमेरिकी छूट की अवधि हाल ही में समाप्त हो गई है, लेकिन भारतीय उद्योग ने इसके विकल्प तलाश लिए हैं और रूसी तेल अब भी 'डेटेड ब्रेंट' के मुकाबले 1 से 2 डॉलर प्रति बैरल के डिस्काउंट पर मिल रहा है.
इस बीच, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने हाल ही में हॉर्मुज क्षेत्र के बंदरगाहों से तेल और एलपीजी लाने के लिए बड़े जहाजों को किराए पर लेने के वास्ते निविदाएं जारी की हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल बाजार की स्थिति और जहाजों की उपलब्धता जांचने की एक प्रक्रिया है, इसे मध्य-पूर्व से तेल आयात की तत्काल बहाली का संकेत नहीं माना जाना चाहिए.