पहली शादी कायम तो लिव-इन से नहीं मिलेंगे अधिकार: हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि महिला की पहली शादी कानूनी रूप से कायम है और उसका विधिवत विच्छेद नहीं हुआ है, तो लिव-इन रिलेशनशिप या किसी पुरुष द्वारा बच्चों को स्वीकार कर लेने मात्र से न तो वैवाहिक अधिकार मिल सकते हैं और न ही संपत्ति में उत्तराधिकार का हक.
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस ए.के. प्रसाद की डिवीजन बेंच ने बिलासपुर के एक व्यवसायी की कथित पत्नी और उसकी दो बेटियों की याचिका खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. याचिका में महिला ने स्वयं को व्यवसायी की कानूनी पत्नी और बेटियों को उसकी वैध संतान व उत्तराधिकारी घोषित करने की मांग की थी.
मामले के अनुसार, महिला की पहली शादी वर्ष 1960 में हुई थी. बाद में उसने 1971 में दूसरे पुरुष के साथ वैवाहिक रस्में निभाने और लंबे समय तक पत्नी के रूप में साथ रहने का दावा किया. बेटियों का कहना था कि उनका जन्म इसी संबंध से हुआ और जीवनकाल में व्यवसायी ने उन्हें अपनी संतान के रूप में स्वीकार किया था.
हालांकि अदालत ने पाया कि महिला की पहली शादी के समाप्त होने का कोई कानूनी प्रमाण न तलाक, न विवाह निरस्तीकरण और न ही पहले पति की मृत्यु का सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद है.
हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 और 11 का हवाला देते हुए कहा कि पहली शादी के रहते दूसरी शादी कानूनन शून्य है. साथ ही भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत यह मजबूत अनुमान माना जाता है कि वैध विवाह के दौरान जन्मी संतान उसी पति की होती है, जब तक इसके विपरीत ठोस और निर्णायक सबूत न हों.
अदालत ने आधार कार्ड सहित अन्य सरकारी दस्तावेजों का भी उल्लेख किया, जिनमें बेटियों के पिता के रूप में पहले पति का ही नाम दर्ज था. कोर्ट ने साफ किया कि बाद में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बच्चों को स्वीकार करना या बयान देना, कानूनन उत्तराधिकार और वैवाहिक दर्जे को बदल नहीं सकता.
अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह विवाद संपत्ति के दावे से जुड़ा है और “कानूनी रिश्ते और विरासत अधिकार व्यक्तिगत समझौतों या कानून के खिलाफ बयानों से तय नहीं किए जा सकते.” इस फैसले के साथ ही याचिकाकर्ताओं को व्यवसायी की संपत्ति में किसी भी तरह का वैवाहिक या उत्तराधिकार अधिकार देने से इनकार कर दिया गया.