मोदी सरकार 1 रुपये के बदले छत्तीसगढ़ को कितना लौटाती है?
छत्तीसगढ़ से मोदी सरकार टैक्स के रूप में 1 रु. के बदले कितना वापिस करती है
रायपुर | संवाददाता: छत्तीसगढ़ केंद्र सरकार को विभिन्न तरह के जो टैक्स देता है, उसके बदल राज्य को क्या मिलता है? छत्तीसगढ़ अगर केंद्र को 1 रुपये देता है, तो बदले में उसे केंद्र सरकार 1 रुपये 86 पैसे लौटाती है. लेकिन हर राज्य इतने खुशनसीब नहीं हैं. अब जैसे महाराष्ट्र को ही लें. वह केंद्र को 1 रुपये देता है और बदले में केंद्र सरकार उसे 0.08 पैसे वापस करती है.
क्या आप जानते हैं, आप जो टैक्स भारत सरकार को देते हैं, उस टैक्स के पैसे को भारत सरकार किस तरह आपको लौटाती है ? दरअसल इनकम टैक्स, जीएसटी या कहीं और से प्राप्त हुई राशि का खर्च भारत सरकार रक्षा, पुलिस, न्यायिक व्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा जैसे आवश्यक खर्चों के लिए करती है.
टैक्स से प्राप्त होने वाली राशि का इस्तेमाल प्रमुख रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और बुनियादी ढांचे के विकास पर किया जाता है. इसके अलावा, आपके ही द्वारा चुकाए गए टैक्स से सरकार विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं चलाती है.
जिनमें रोजगार से जुड़ी योजनाएं भी शामिल हैं। विभिन्न सरकारी और प्रशासनिक विभागों में लाखों कर्मचारी काम करते हैं, जिनका वेतन और अन्य खर्च सरकार आपके टैक्स के पैसों से वहन करती है। केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स को लेकर अक्सर विवाद रहता है, खासकर टैक्स के बंटवारे को लेकर. राज्यों को लगता है कि केंद्र सरकार उन्हें पर्याप्त हिस्सा नहीं देती, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि राज्यों को वित्तीय सहायता दी जाती है.
दरअसल भारत के संविधान में अनुच्छेद-268 से लेकर 293 तक में केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय संबंधों को बखूबी बताया गया है. अब मोटा-मोटा आप समझ लीजिए कि केंद्र सरकार कई ऐसे कर वसूलती है, जो राज्य सरकारें नहीं वसूल सकतीं. इनमें इनकम टैक्स, उत्पाद शुल्क और आयात-निर्यात कर इत्यादि शामिल हैं.
पहले राज्य सरकारें अपने स्तर पर कई अप्रत्यक्ष कर वसूलती थीं, लेकिन जीएसटी आने के बाद अप्रत्यक्ष कर के संग्रह में भी केंद्र की हिस्सेदारी बढ़ गई है. जिससे राज्यों को राजस्व में हानि हो रही है. वहीं पेट्रोल-डीजल इत्यादि पर वैट अभी भी राज्य सरकारों के हाथ में है.
इस तरह राज्य सरकार की आय केंद्र के मुकाबले कम होती है और वह अपना हिस्सा मांगने के लिए केंद्र पर ही निर्भर करते हैं. टैक्सेज की बात करें तो एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट बताती है कि इनकम टैक्स के मामले में देश के पांच राज्य लगभग आधी हिस्सेदारी रखते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, टोटल आईटीआर में लगभग 50 फीसदी सिर्फ 5 राज्यों महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और पश्चिम बंगाल से फाइल किए जाते हैं. वहीं वित्त मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दी गई एक जानकारी के अनुसार, प्रत्यक्ष करों से आए कुल राजस्व में सिर्फ चार राज्यों महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात और तमिलनाडु ने मिलकर 70 फीसदी का योगदान दिया था.
इनडाइरेक्ट टैक्स यानी जीएसटी भरने में महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश क्रमश: सबसे आगे हैं. कर्नाटक समेत कई दक्षिण भारत के राज्यों का आरोप है कि केंद्र को जो राज्य ज्यादा टैक्स जुटा कर दे रहे हैं, उन्हें दूसरों के मुकाबले कम फंड दिया जाता है.
इन राज्यों का आरोप है कि केंद्र सरकार उत्तर भारत के राज्यों को कम टैक्स देने पर भी ज्यादा फंड देती है.
कौन से राज्य केंद्र को कितना राजस्व देते हैं
उत्तर प्रदेश भले ही आबादी के लिहाज से देश का सबसे बड़ा राज्य है लेकिन डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन के मामले में ये देश के दूसरे कई राज्यों से बहुत पीछे है. सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स ने टैक्स कलेक्शन का जो आंकड़ा जारी किया है, उसके मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में कुल डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में उत्तर प्रदेश ने केवल 48,333.44 करोड़ रुपये का योगदान दिया है.
जबकि आबादी के मामले में देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य बिहार का वित्त वर्ष 2023-24 में कुल डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 6692.73 करोड़ रुपये रहा, जो वित्त वर्ष 2022-23 के 6845.32 करोड़ रुपये से कम है. वहीं सीबीडीटी से डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन को लेकर जो डेटा आया है उसके मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में राज्यों और केंद्र शाशित प्रदेशों को मिलाकर 19.62 लाख करोड़ रुपये डायरेक्ट टैक्स की वसूली की गई.
इसमें सबसे बड़ा योगदान महाराष्ट्र का है. इस वित्त वर्ष में महाराष्ट्र से 7,61,716.30 करोड़ रुपये डायरेक्ट टैक्स आया है. यानि कुल डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में अकेले महाराष्ट्र का योगदान 39 फीसदी है. सरकार के खजाने में यह डायरेक्ट टैक्स के रूप में उत्तर प्रदेश से 15 गुना है.
इसी तरह दुसरे राज्यों की तुलना करें तो झारखण्ड-10,500.59 करोड़, गुजरात- 93,300.72 करोड़, मध्यप्रदेश- 20,086.99 करोड़ और छत्तीसगढ़ ने 13,534.13 करोड़ दिया है.केन्द्र राज्यों को कर का हिस्सा लौटाता है.केंद्र सरकार बिहार जैसे राज्य, जो की सबसे कम राजस्व जमा करता हैं उसे सबसे ज्यादा पैसा देती है.
बिहार अगर कर के रुप में केंद्र सरकार को 1 रूपए देता है, तो उसके बदले बिहार को केंद्र सरकार 7.26 रुपए देती है. वहीं मध्यप्रदेश को 1 रूपए के बदले 2.09, उत्तरप्रदेश- को 1 रूपए के बदले 2.49 रूपए मिलते हैं. आपके लिए हैरान करने वाला आंकड़ा ये हो सकता है कि देश में सबसे ज्यादा राजस्व देने वाला राज्य महाराष्ट्र है, जिसे केंद्र 1 रूपए के बदले केवल 0.08 पैसे लौटाता है. इन आंकड़ों से ये बात तो साफ हो जाती है कि ज्यादा टैक्स देने वाले राज्यों को राजस्व में कम हिस्सा मिलने वाली बात फैक्चुअली गलत नहीं है.
उदाहरण के लिए- बिहार सबसे ज्यादा टैक्स देने वाले राज्यों में दूर-दूर तक नजर नहीं आता है, लेकिन राजस्व में उसका हिस्सा सिर्फ उत्तर प्रदेश से कम है. वहीं राजस्व जमा करने में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य राजस्व में हिस्सा पाने के मामले में टॉप-5 से भी बाहर हैं.
केद्र सरकार योजनाओं के माध्यम से राज्यों को हिस्सा देती है
स्वच्छ भारत मिशन (SBM): यह योजना व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए है, जिसमें खुले में शौच को खत्म करना और ठोस कचरा प्रबंधन शामिल है. केंद्र और राज्य दोनों मिलाकर इस व्यवस्था को लागू करते हैं.
स्वच्छ भारत मिशन में केंद्र और राज्यों के बीच निधि बंटवारे का अनुपात अलग-अलग है: पूर्वोत्तर राज्यों, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10, अन्य राज्यों के लिए 60:40 है
आयुष्मान भारतः यह योजना भारत में स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को बेहतर बनाने के लिए है, जिसमें गरीब और जरूरतमंद परिवारों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया जाता है. स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार आयुष्मान भारत योजना राज्यों और केंद्र दोनों के सहयोग से चलती है, जिसमें आने वाले खर्च का 60 फीसद केंद्र सरकार वहन करती है और 40 फीसद राशि राज्यों को देनी होती है.
पीएमएवाई-जी (ग्रामीण) के लिएः पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर) के लिए:केंद्र और राज्य के बीच वित्तपोषण साझेदारी 90:10 है.अन्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच वित्तपोषण साझेदारी 60:40 है.
विधानसभा रहित केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्र सरकार 100% वित्तपोषण वहन करती है. इस तरह और भी कई योजनाएं हैं जिसमें राज्य सरकार और केंद्र सरकार की हिस्सेदारी होती है.
राज्यों और केन्द्रों के बीच कैसे होता है करों का बंटवारा
देश के संविधान में अनुच्छेद-280 में वित्त आयोग बनाने का प्रावधान है. इसके दो ही मुख्य काम हैं, जिनमें से एक है केंद्रीय करों में से राज्यों के हिस्से की सिफारिशें करना. देश में जब 10वां वित्त आयोग बना तो केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे का एक नियम बना लिया गया. अभी देश में 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें काम कर रही हैं, जो 2026 तक मान्य रहेंगी.
14वें वित्त आयोग ने केंद्र सरकार के कुल कर संग्रह में से 42 प्रतिशत राज्यों के बीच बांटने की सिफारिश की थी, जिसे 15वें वित्त आयोग में 41 प्रतिशत कर दिया गया. एक प्रतिशत हिस्सा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनने के चलते अलग रखा गया.
केंद्र और राज्यों के बीच करों का बंटवारा एक वेटेज सिस्टम के आधार पर होता है. इसमें राज्यों को कई मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे कि डेमोग्राफिक परफॉर्मेंस, इनकम, आबादी, जंगल और इकोलॉजी एवं कर जुटाने के साथ-साथ घाटा कम करने के लिए किए गए प्रयास. लेकिन पिछले कुछ सालों में राज्यों के बीच, राजस्व देने के बदले मिलने वाली रकम को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है.
महाराष्ट्र समेत दक्षिण भारत के राज्य अब इस व्यवस्था को बदलने की मांग करने लगे हैं. उनका सवाल है कि दूसरे राज्यों के विकास का बोझ, उन्हें क्यों उठाना चाहिए ? जाहिर है, इसके जवाब में कई पेंच हैं और कम से कम केंद्र सरकार इस पेंच में नहीं उलझना चाहती.