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ममता के अजेय दुर्ग को भाजपा ने कैसे ध्वस्त किया?

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04 मई 2026, 06:34 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

सुवेंदु अधिकारी
सुवेंदु अधिकारी

कोलकाता । डेस्क: पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक युगांतरकारी बदलाव दर्ज करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के 15 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका है. जिस बंगाल को ममता बनर्जी का अभेद्य किला माना जाता था, वहां 'कमल' का खिलना राजनीतिक विश्लेषकों के लिए चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन बारीकी से देखने पर यह एक सोची-समझी रणनीति और जन-आक्रोश का परिणाम नजर आता है. 


इस ऐतिहासिक उलटफेर के पीछे सबसे प्रमुख कारणों में से एक भाजपा की अपनी रणनीति में किया गया आमूल-चूल बदलाव था. 2021 की गलतियों से सबक लेते हुए भाजपा ने इस बार 'बाहरी' होने के टैग को हटाने के लिए जी-जान लगा दी. पार्टी ने दलबदलुओं को टिकट देने के बजाय अपने जमीनी कार्यकर्ताओं पर भरोसा जताया, जिसका फायदा उन्हें मिला. रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम का बार-बार उल्लेख, और स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य बिठाने की कोशिशों ने जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ाई. 


'भय बनाम भरोसा' और 'निर्ममता की सरकार' जैसे नारों ने सीधे मतदाताओं के दिल पर चोट की. 'पलटानो दरकार' यानी 'बदलाव जरूरी है' का नारा न केवल गांवों में गूंजा, बल्कि कोलकाता के स्कूली बच्चों की जुबान पर भी चढ़ गया, जिसने चुनाव से पहले ही बदलाव की जमीन तैयार कर दी थी.


इस हार की पटकथा लिखने में निर्वाचन आयोग की सख्त निगरानी और केंद्रीय बलों की भूमिका भी निर्णायक रही. राज्य प्रशासन के करीबी माने जाने वाले कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले और जमीनी स्तर पर दबदबा रखने वाले 'बाहुबलियों' की निष्क्रियता ने टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर कर दिया. विशेष रूप से मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) ने खेल का रुख पूरी तरह मोड़ दिया. 


इस प्रक्रिया में राज्य से बाहर जा चुके और मृत मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटाए गए, जिसे भाजपा 'फर्जी वोटों की छंटनी' करार दे रही है. करीब 2 लाख केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती ने धांधली की शिकायतों को न्यूनतम कर दिया, जिससे आम मतदाता बिना किसी डर के बूथ तक पहुंच सका. 


साथ ही, रोजगार के लिए बाहर गए लाखों प्रवासियों का वोट देने के लिए वापस लौटना ममता सरकार के खिलाफ एक मूक विद्रोह की तरह था, जिन्होंने अपनी घर वापसी को एक 'सजा देने के अवसर' के रूप में इस्तेमाल किया.


सत्ता विरोधी लहर या एंटी-इंकंबेंसी भी इस पतन का एक बड़ा कारण बनी. 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं, तब उन्होंने ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित किया था, लेकिन धीरे-धीरे उनकी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों के जाल में फंसती गई. सारदा और नारदा कांड से शुरू हुआ यह सिलसिला शिक्षक भर्ती घोटाले, राशन वितरण अनियमितताओं और कोयला-मवेशी तस्करी तक जा पहुंचा. 


वरिष्ठ मंत्रियों की गिरफ्तारी और करोड़ों रुपये की नकदी की बरामदगी ने 'ईमानदार छवि' वाले दावों की धज्जियां उड़ा दीं. हालांकि टीएमसी ने कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपनी पैठ बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन 'सिंडिकेट राज' और जबरन वसूली की शिकायतों ने जनता के मन में कड़वाहट भर दी थी.


तुष्टीकरण और ध्रुवीकरण की राजनीति ने भी इस चुनाव में स्पष्ट भूमिका निभाई. ममता बनर्जी के 'दूध देने वाली गाय' जैसे बयानों को भाजपा ने हथियार बनाकर बहुसंख्यक समाज के बीच पैठ बनाई. कैनिंग, आसनसोल और बशीरहाट जैसे इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं ने प्रशासनिक विफलता को उजागर किया. 


हालांकि अंतिम समय में टीएमसी ने जगन्नाथ मंदिर और दुर्गा आंगन जैसे निर्माणों के जरिए अपनी छवि सुधारने की कोशिश की, लेकिन मतदाताओं ने 'बी टीम' के बजाय भाजपा को ही चुना. चुनाव बाद के आंकड़े बताते हैं कि हिंदू वोटों का लगभग 62 प्रतिशत भाजपा के पक्ष में गया, जो बंगाल जैसे राज्य के लिए अभूतपूर्व है.


अंततः, ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोट बैंक महिलाएं भी इस बार छिटकती नजर आईं. लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के जरिए महिलाओं को नकद लाभ देने की कोशिश 'आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड' की गूंज के सामने फीकी पड़ गई. अगस्त 2024 की उस वीभत्स घटना और उसके बाद प्रशासन के ढुलमुल रवैये ने कोलकाता सहित पूरे बंगाल की महिलाओं को सड़कों पर उतार दिया. 


आरजी कर कांड ने न केवल सुरक्षा के दावों को खोखला साबित किया, बल्कि एक गैर-राजनीतिक आबादी को भी सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया. वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारधाराओं का एक साथ आना इस चुनाव की सबसे दिलचस्प कहानी रही. 


दिल्ली के एक रेस्तरां की उस घटना की तरह, जहां एक धुर दक्षिणपंथी और एक पूर्व एसएफआई नेता टीएमसी के खिलाफ एकजुट थे, बंगाल की जमीन पर भी 'शत्रु का शत्रु मित्र होता है' की तर्ज पर वोट पड़े. भावनाओं के इस ज्वार में राजनीतिक गणित बह गया और बंगाल ने एक नए युग की शुरुआत के पक्ष में जनादेश दे दिया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP