हॉर्मुज: ओमान के नए समुद्री मार्ग पर IRGC की चेतावनी
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' में शांति की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है. ईरान के शक्तिशाली सैन्य संगठन 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने वाणिज्यिक जहाजों को सख्त चेतावनी जारी की है कि वे इस जलमार्ग से गुजरते समय केवल तेहरान द्वारा स्वीकृत रास्तों का ही उपयोग करें.
इस चेतावनी ने चार महीने से चल रहे अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध को रोकने के लिए पिछले हफ्ते हुए समझौते (MoU) के बाद शुरू हुई शांति वार्ताओं पर फिर से अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं.
दरअसल, यह नया विवाद तब शुरू हुआ जब ओमान ने बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के समन्वय से एक नए शिपिंग ट्रांजिट रूट की घोषणा की. हफ्तों की रुकावट के बाद समुद्री यातायात को धीरे-धीरे बहाल करने के उद्देश्य से इस मार्ग को तैयार किया गया है.
लेकिन ईरान की आईआरजीसी ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए साफ कर दिया है कि बिना उसकी सहमति या परामर्श के घोषित किया गया कोई भी नया कॉरिडोर स्वीकार्य नहीं है और यह सुरक्षा के लिहाज से बेहद खतरनाक है. ईरान का दावा है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले सभी जहाजों को उसके नौसैनिक नियंत्रण और संपर्क में रहना होगा.
वैश्विक ऊर्जा संकट और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज की अहमियत:
यह जलमार्ग दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. वैश्विक स्तर पर कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी तंग रास्ते से होकर गुजरता है. उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से घिरे इस जलमार्ग की चौड़ाई सबसे संकीर्ण बिंदु पर केवल 33 किलोमीटर है, लेकिन यह इतना गहरा है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर भी यहां से आसानी से निकल सकते हैं.
वर्ष 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, इस रास्ते से रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल का परिवहन होता है, जो अरबों डॉलर के वैश्विक व्यापार को संचालित करता है. इराक, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और यूएई जैसे बड़े ऊर्जा निर्यातक देश अपने व्यापार के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं. यही वजह है कि इस रास्ते पर नियंत्रण ईरान के लिए अमेरिका के खिलाफ सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार रहा है.
ओमान के नए समुद्री मार्ग पर ईरान की आपत्ति का कारण:
विशेषज्ञों के अनुसार, आईआरजीसी की झुंझलाहट का मुख्य कारण यह है कि ओमान द्वारा तैयार किया गया नया रूट जहाजों को ईरान के सीधे नियंत्रण वाले क्षेत्र से बचाकर निकालता है. ईरान ने अप्रैल में अपना एक नक्शा जारी किया था, जिसमें वाणिज्यिक जहाजों को ईरानी तट के बहुत करीब से गुजरने का निर्देश दिया गया था.
गुरुवार को जब एक लाइबेरियन तेल टैंकर ओमान के तट के करीब वाले नए रास्ते से गुजरा, तो ईरान भड़क गया.
वहीं दूसरी तरफ, ओमान के विदेश मंत्री बदर अल्बुसैदी ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह कॉरिडोर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत नौवहन की सुरक्षा बहाल करने के लिए बनाया गया है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस जलमार्ग के उपयोग के लिए किसी भी तरह का ट्रांजिट शुल्क नहीं लगाया जाएगा.
समझौते के भविष्य और 'टैक्स' पर फंसा पेंच:
अमेरिका और ईरान के बीच हुए 60 दिनों के इस अस्थायी समझौते में ईरान इस बात पर सहमत हुआ था कि वह फारस की खाड़ी से ओमान की खाड़ी तक वाणिज्यिक जहाजों के सुरक्षित और मुफ्त आवागमन के लिए अपनी ओर से सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेगा. इसके तहत समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों को हटाने का काम भी ईरान को 30 दिनों के भीतर पूरा करना है.
लेकिन सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि 60 दिनों की इस अवधि के खत्म होने के बाद क्या होगा. ईरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बागेर गालिबफ ने संकेत दिए हैं कि युद्ध के बाद अब हॉर्मुज की स्थिति पहले जैसी नहीं रहेगी, जिससे यह अंदेशा बढ़ गया है कि ईरान भविष्य में यहां से गुजरने वाले जहाजों पर टैक्स या टोल वसूलने की तैयारी कर रहा है.
अमेरिका का कड़ा रुख और क्षेत्रीय देशों की चिंता:
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन और क्षेत्रीय दौर पर आए मार्को रुबियो ने ईरान की इस संभावित योजना को सिरे से खारिज कर दिया है. अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह एक अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग है और किसी भी देश को यहां से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है.
अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यदि ईरान की बयानबाजी धरातल पर जहाजों के लिए खतरा बनती है, तो इसे समझौते का उल्लंघन माना जाएगा. खाड़ी देशों के संगठन (GCC) ने भी इस मामले में अमेरिका का समर्थन किया है.
यूएई ने साफ किया है कि अरब खाड़ी देशों पर किसी भी तरह के नए भू-राजनीतिक तथ्य थोपने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. फिलहाल इस तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत गिरकर 72.24 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई है, लेकिन अगर वार्ताओं का यह 60 दिनी चक्र विफल रहता है, तो दुनिया को एक बार फिर भीषण आर्थिक और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है.